Heart Touching Kahaniya

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जाता हुआ दिसंबरसुबह की गुनगुनी धूप में प्रभा और दादी आंगन में बैठी हैं। रोज़ सुबह की चाय दादी को यहीं आंगन में पसंद आती ...
04/02/2025

जाता हुआ दिसंबर
सुबह की गुनगुनी धूप में प्रभा और दादी आंगन में बैठी हैं। रोज़ सुबह की चाय दादी को यहीं आंगन में पसंद आती है।
बड़े से घर में जहां हर वक्त हंसी मजाक शोर हुआ करता था वहां आज सन्नाटा बिखर गया है। कोरोना ने इस घर से प्रभा के पति, बड़ा बेटा,बहू, पोते को छीन लिया।
सारा घर अब उजाड़ बियाबान सा लगता। प्रभा, दादी और छोटे बेटे का परिवार सब रहते तो साथ लेकिन सब अपने में सिमटे हुए।
किसी में हिम्मत नहीं बची थी की वो दूसरे को हौसला दे हिम्मत बढ़ाए। सभी अपने अपने दुःख में लिपटे हुए जिए जा रहे थे।
सबसे मुश्किल दादी के लिए था जिनकी आंखों के सामने इतने सारे लोग बिछड़ गए थे। कितना कठिन होता है जिन्हे कंधा देना हो उनको ही अंतिम यात्रा में बिदाई देनी पड़े।
उम्र के अस्सी दशक देख चुकी दादी शरीर से जितनी मजबूत थीं उससे ज्यादा अब उन्होंने अपने मन को मजबूत कर लिया था। घर का उदास माहौल उनसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। ठीक है की अपनों के जाने का दुःख खत्म नहीं होता लेकिन जो जिंदा हैं उनके लिए तो जीना पड़ता है, दुःख को दबाकर हंसी लानी पड़ती है चेहरे में। जीवन की स्लेट पर पुरानी इबारत मिटाकर नई कहानी लिखने का समय आ गया है ऐसा उन्हें लग रहा था।
चाय पीते हुए उन्होंने प्रभा से कहा "बहू! देखो ये सुबह की धूप कितनी प्यारी लगती है, पर इसके लिए सारी रात ठंड और अंधकार भी सहना पड़ता है, ऐसे ही जीवन में बुरा समय जब आता है तो उसके आगे अच्छा वक्त भी रखा होता है। उस बुरे समय से जूझना उससे लड़कर आगे निकलना आसान नहीं होता पर नामुमकिन भी नहीं होता। जो छोड़ गए हमें उनकी यादें जीवन भर साथ रहेंगी, पर यादों के सहारे जीवन नहीं व्यतीत किया जा सकता। भविष्य के लिए अतीत का त्याग करना जरूरी होता है बेटी। तुम्हें ही सम्हालना है परिवार को। जाते हुए साल को विदा करो और आने वाले समय का स्वागत करो।"
प्रभा की उदास आंखों की नमी दादी की बातों से जैसे भाप बनकर उड़ने लगी। उसने तय किया कि साल के आखरी महीने की शेष होती तारीखों को विदा कर वह भी नए साल में नई शुरुआत करेगी।
आखिर जो साल चला जाता है वो लौटकर नहीं आता। बस यादें रह जाती हैं उनकी।
© संजय मृदुल

मंच को सादर प्रणाम *गूंगी नहीं थी वो*              फलक फेसबुक लघु कथाएंवसुंधरा नाम था उसका पर उसके नाम के साथ धरा नहीं ज...
04/02/2025

मंच को सादर प्रणाम
*गूंगी नहीं थी वो*
फलक फेसबुक लघु कथाएं
वसुंधरा नाम था उसका पर उसके नाम के साथ धरा नहीं जुड़ी थी
खाली दिमाग लिए अस्त-व्यस्त यूं ही बैठी रहती
ना किसी से कुछ, कहती, ना सुनती
परिवार में, लोग उसे पगली कहने लगे थे
थोड़ा दिमाग कमजोर था , तो कुछ दिल , वो बस,बालमन की शादी का साथ नहीं बिठा पाई
कभी, सास के साथ ,ससुराल वालों के साथ अपने संबंधो की
देती रही दुहाई, पर एक भी बात उसके कहीं काम ना आई
बस, एक रात दूर कहीं किसी,चौराहे पर, रोक कर उसका पति उसे छोड़ निकल गया, और... दूर ..., बहुत दूर तक !
बस, जमाने भर की बुराईयों को उसके लिए संजो कर !
वो रात भर, दुनिया के, उस बड़े से आश्रय दाता, पेड़ के नीचे खुले आसमान के नीचे गठरी सी सिमटी, सोचती रही क्या कसूर था मेरा?
मां बाप ने पूछा नहीं?
कच्ची उम्र में ब्याह दिया तब वो अल्हड़ सी बच्ची थी
पति के तो, नाम से ही डरती थी कभी पति आंख दिखाता, तो कभी सास!
इन दोनों के बीच में वो,खुद से ही दूर भागती रही
अभी 18 की भी नहीं हुई की लानत मानत के साथ बाझ का तगमा दे दिया
कहां भूल हो गई जो, ईश्वर ने उसे इसके बालमन का यह सिला दिया
ससुराल वालै ने,सभी को कहा था, कि इसे बोलना नहीं आता
पर वो, गूंगी तो नहीं आई थी
शब्द दबा दिए, भाव दबा दिए।
और फिर जीभ के साथ अरमान भी दबा दिये!
सुबह होते ही चुपचाप टुकुर टुकुर ताकती इधर उधर एक लड़की को देख, सामने वाली, टपरी के चाय वाले ने, एक पाव और चाय का गिलास थमा दिया, शायद वो भला मानस उसके रात भर बाहर बैठे रहने से ही उसकी बात पढ़ गया था
वह दिन भर यूं ही बैठी रही दोपहर बाद ठेले खोमचे वालों की चहल-पहल बढ़ गई थी
फिर से खुली रात में रहने के नाम से उसकी तो हवा खुश्क हो गई थी
वो धीरे से उठी और टपरी वाले से बोली, भैया!
मैं तुम्हारे,चाय के बर्तन धो दिया करूंगी
मुझे यहां अपनी ठेली के साथ बैठने दिया करो!
चाय वाला मुस्कुराया, बोला बहन, मैं तुम्हें अपने घर छोड़ आता हूं
घबराओ नहीं,घर पर मेरी मां और बच्चे हैं
बीवी कई साल पहले सिधार गई काम में जुटता हूं और शाम को जाकर उनकी सुध लेता हूं
और फिर, शाम को वो,ठेले , समेत उसके साथ, उसके पीछे पीछे उसके घर चल दी
घर पर बूढ़ी मां खटिया से चिपकी थी
छोटे छोटे,बच्चे उसे, मां मां कहते, उसके आंचल से लिपट रहे थे
उसके मुंह में तो, जैसे शब्दों की बाढ़ आ गई थी
वो सिर से पांव तक ममता के आंचल में भीग गई थी
वो , सही कह रही थी
गूंगी नहीं हूं मैं!
ना ही पागल हूं!
आज वो भी नए सिरे से आगे बढ़ेगी!
क्या जरूरी है बच्चों को मां मिले!
वो , उनकी बुआ बनकर उनके साथ रहेगी
अम्मा ने उसे खुले दिल से अपना लिया था और वह टपरीवाला भाई बनकर उसके आगे आंसू बहा रहा था
बहन सुरक्षित हो यहां पर बस... चाहो तो, मेरे इन बच्चो को संभाल लेना
मैं निश्चिंत होकर काम पर जाऊं इतनी राह बुहार देना...
लेखिका अर्चना नाकरा

कशमकश"आंटी ये लो प्रशाद"अनिता ने पीछे मुड़ कर देखा तो दरवाजे से अभी अंदर आयी थी मीरामीरा अनिता के घर मे पिछले सात आठ महीन...
04/02/2025

कशमकश
"आंटी ये लो प्रशाद"अनिता ने पीछे मुड़ कर देखा तो दरवाजे से अभी अंदर आयी थी मीरा
मीरा अनिता के घर मे पिछले सात आठ महीने से काम कर रही थी। आज पहली बार उसने मीरा को इतनी सजी धजी और खुश देखा था। रंग बिरंगी कढ़ाई वाली साड़ी, बड़े से झुमके ,हाथ मे भरी भरी चूड़ियां, वो तो एक दम से पहचान ही नही पायी कि ये वो ही मीरा है जो रोज उसके घर काम करने आती है।
कोठी वाली बीबियों से मिले पुराने कपड़े ही नहा कर पहन ले इससे ज्यादा टाइम कहाँ होता है इनके पास । रोज पहले घर के सब काम निपटा कर फिर पांच पांच कोठियों में भाग भाग कर काम करना।इसी भागदौड़ में तो पूरा दिन निकल जाता था मीरा का भी।
लेकिन पिछले आठ दस दिन से मीरा कुछ ज्यादा ही उत्साहित नजर आ रही थी। एक दिन उसने अनिता को बताया कि उनका त्योहार आ रहा है छठ पूजा ।
अनिता ने इस से पहले अपने देखने मे किसी को ये त्योहार मनाते हुए नही देखा था। पहली बार मीरा उसके घर लगी थी जो बिहार से थी। दीपावली के दिन भी अनिता को लगा था कि आज ये अवश्य काम करने नही आएगी लेकिन उसने बोला कि आज तो मैं आऊंगी जब हमारा त्योहार होगा तब छुट्टी दे देना और थोड़े पैसे भी एडवांस में देना।
तीन दिन खूब तैयारियां हुई, मिठाईयां बनी , नए कपड़े आये। बहुत ज्यादा उत्साहित थी वो अपने त्योहार को लेकर।
और आज जब सुबह के अर्घ्य और पूजन के साथ त्योहार की समाप्ति हुई थी तो मीरा एक बड़े से लिफाफे में छठ पूजा का प्रशाद जिसमे फल और उसके घर की बनी मिठाईयां थी,अनिता के घर ले कर आई थी।
अनिता कशमकश में थी कि क्या करूँ प्रशाद रखूं कि नही रखूं।
क्योंकि हमेशां जरूरतमंदों को इन हाथों से देना ही सीखा है और कोशिश की है कि जितना हो सके उनकी मदद करूँ।
लेकिन वो प्रशाद को वापिस करके उसकी भावनाओं को भी ठेस नही पहुंचाना चाहती थी इसलिए कुछ पल के लिए दुविधा में पड़ गयी कि क्या करूँ।
"आंटी ये लो प्रशाद रख लो,"मीरा ने जब दोबारा कहा
तो अनिता ने मीरा के सामने ही एक केला और एक गुझिया प्लेट में निकाली और बोली,
"देखो मीरा मेरे घर में इतना प्रशाद कोई खाने वाला तो है नही ।तुम्हारे घर तो छोटे बच्चे हैं खाने वाले। इसलिए ये देखो मैंने थोड़ा सा ले लिया है। प्रशाद तो प्रशाद होता है चाहे थोड़ा सा ही हो ये देखो मैं तो अभी खाने लगी," ये कहते हुए अनिता ने उसी समय थोड़ी सी मिठाई का टुकड़ातोड़ कर अपने मुँह में रख ली।
और मीरा ये देख कर खुशी खुशी बाकी का लिफाफा ले कर चली गयी।
मौलिक एवम स्वलिखित

लघुकथ- सिर्फ प्यार ही प्यार ***************************                                      "मेरी मानो तो इस बार कवाचौथ...
04/02/2025

लघुकथ- सिर्फ प्यार ही प्यार
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"मेरी मानो तो इस बार कवाचौथ का व्रत तुम मत रखो।" मेरी व्रत रखने की तयारी को देखते हुए मेरे पति विवेक जी बोले।
-"ये आप कैसी बात कर रहें हैं ? बाइस वर्ष के विवाहित जीवन में
अभी तक आपने कभी भी ऐसा नहीं कहा।" मैंने अपनी बात रखी।
-"इतने वर्षों में तुम कभी इतनी गंभीर बीमार भी तो नहीं पड़ी। पिछले दिनों तुम्हें कितना गंभीर पीरिया (जोंडिस) होगया था। कितनी मुश्किल से ठीक हुई तुम। कमजोर भी कितनी हो गई हो। मैं नहीं चाहता कि तुम फिर किसी मुश्किल में पड़ो।" विवेक बोले।
-आपकी चिंता जायज हैं। और यह मेरे प्रति आपके प्यार को भी दर्शाती हैं। पर क्या आपको अच्छा लगेगा कि मेरा आपके प्रति प्रेम दर्शाने वाला ये व्रत नहीं रखकर मैं अपराध बोध में जियूं ? मैंने कहा।
-कैसा अपराध बोध जी?
- यही कि मैं अपने पति की सुदीर्घ आयु और अच्छे स्वाथ्य के लिए ये छोटा सा व्रत भी नहीं रख सकती।मैंने नम आँखों से विवेक की ओर देखते हुए कहा।
-वे फ़ौरन कान पकड़ते हुए बोले -देवी जी माफ़ करना।आपके स्वाथ्य की चिंता वश मैं ये कह गया। पर आप अपनी मर्जी का ही करिये। बस आज के दिन अश्रु नहीं।
"सिर्फ प्यार ही प्यार।" उनके इस नाटक पर मैं ठहाका लगा कर हंस पड़ी।
***************
श्याम आठले (ग्वालियर,म-प्र )
स्वरचित /मौलिक

आईना) ऐसा नहीं कि उसने कभी आईना नहीं देखा मगर आज पहली दफा  जब आईना देखा तो अवाक रह गई वह खुद को देखकर  । चेहरे की झुर्रि...
03/02/2025

आईना)
ऐसा नहीं कि उसने कभी आईना नहीं देखा मगर आज पहली दफा जब आईना देखा तो अवाक रह गई वह खुद को देखकर ।
चेहरे की झुर्रियाँ और बालों की सफेद काली खिचड़ी गवाही दे रही थी कि जिंदगी रूपी रेत बहुत फिसल चुकी है मुट्ठी से।
पहले बचपन रुँठा था और अब यौवन ने भी समय के संमुख नतमस्तक होकर हथियार डाल दिए हों।
अव प्रश्न उठा।
"इतने दिनों तक तुमने किया क्या? "
सुनते ही व झेंप गई और इधर उधर बगलें झांकने लगी। आज पहली दफ़ा खुद को ही जवाब देना मुश्किल हो गया।
लेकिन दिल कभी झूठ नहीं बोलता.... शुरू हो गया।
"बचपन तो सभी का प्रिय होता है, सभी इसका भरपूर लुफ्त उठाते हैं, माता पिता अपने बच्चों की परवरिश में दिलो जान लगा देते हैं और बच्चे भी अपनी जिद और मासुमियत से सभी का दिल जीतकर खूब आनंद लेते हैं और फिर कुछ दिनों बाद दस्तक दे जाता है यौवन जिसका नशा सिर चढ़कर बोलता है, खुद को आसमां में उड़ता हुआ परिंदा महसूस करता है इंसान।
मौका ही नहीं मिलता मद के नशे में खुद को तराशने का हाँ बहुत सी गलतियाँ इस दौर में अवश्य हो जाती हैं। जो ढलती उम्र में कुंठा का कारण बनती हैं। "
इतना ध्यान अगर चेहरे और इस नश्वर शरीर को सजाने संवारने में देने की अपेक्षा अगर मुझे संवारा होता तो जिंदगी का फलसफा कुछ और ही होता।
अपनी अलग पहचान अपने सार्थक कर्मों से बनाई होती तो यह झुर्रियाँ तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ा रही होतीं। "
सुनते ही एक गहरी सांस ली मैंने और आईने से कहा।
"अब तुम्हें देखकर नहीं संवरूंगी ,खुद आईना बन समाज में एक मिशाल बनूँगी। "
राशि सिंह
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
(मौलिक लघुकथा)

माँआज के समाचार मे एक ख़बर सुन कर माँ की ममता के सम्मुख सर झुक गया… एक पाँच माह का बच्चा कोरोना पाज़ीटिव निकला जबकि उसके म...
03/02/2025

माँ
आज के समाचार मे एक ख़बर सुन कर माँ की ममता के सम्मुख सर झुक गया… एक पाँच माह का बच्चा कोरोना पाज़ीटिव निकला जबकि उसके माँ पिता दोनों निगेटिव थे।नियमों के मुताबिक बच्चे को अस्पताल के आईसोलेशन वार्ड में रखा गया।माँबाप को अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी।वो लोग सिर्फ सीमित समय में शीशे से ही अंदर देख सकते थे।बच्चा माँ के दूध के बिना बेहाल था और इधर माँ बच्चे बिना। चार दिन माँ को किसी तरह सँभाला गया पर पाँचवे दिन उससे बच्चे का रोना बर्दास्त नहीं हुआ और वो डाक्टर नर्सों के रोकने के बावजूद भीतर जा कर बच्चे को दूध पिलाने लगी।बच्चा भी माँ से चिपट कर शांत हो गया।ये दृश्य देख कर सबकी आँखें नम थीं।
पर उसी वक्त उस अस्पताल में एक वृद्ध की कोरोना से मृत्यु हो गई थी और अस्पताल द्वारा उसके बेटों को जब पिता का शव ले जाने के लिए कहा गया तो उन्होंने ये कह कर इंकार कर दिया "वो करोना से मरे हैं हम उनका शव ला कर ख़ुद को खतरे में नहीं डाल सकते.. अस्पताल जो चाहे सो करे"।
मंजू सक्सेना

भटकाव ******"आजकल आपके घर में लड़के लड़कियों की आवाजाही बहुत बढ़ रही है। कौन हैं ये लोग" ? सब्जी के ठेले पर खडी़ शीला को...
03/02/2025

भटकाव
******
"आजकल आपके घर में लड़के लड़कियों की आवाजाही बहुत बढ़ रही है। कौन हैं ये लोग" ? सब्जी के ठेले पर खडी़ शीला को देख कर मधु ने यूं ही पूछ लिया।
" अरे! जब से गुप्ता जी रिटायर हुए हैं, तब सेे घर में बोर होते रहते थे, मेरे कहने पर अब वो और मैं बच्चों को कोचिंग देने लगे हैं, वही आते हैं रोज पढ़ने के लिये "।
" चलो! फिर तो अच्छा काम है, गुप्ता जी व्यस्त भी रहेंगे, और घर में चार पैसे भी आयेंगे।"
" हां यही तो! दोनों बच्चे तो यहां रहते नहीं। हम अकेले हैं, तो हमारा मन भी लगा रहता है "।
दोपहर के वक्त गुप्ता जी के घर के बाहर पुलिस फोर्स को देख कर मुहल्ले वाले घबरा गये - सुबह तक तो सब ठीक था, लेकिन अब ऐसा क्या हो गया। यही जानने के लिये उत्सुक पड़ौसी घर के बाहर जमा हो गए ।
लोग अशंकाओं में घिरे तरह-तरह के कयास लगा रहे थे, लेकिन कोई भी अन्दर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था, कि तभी गुप्ता दम्पत्ति को अरेस्ट कर पुलिस बाहर ले आयी ।
समाज में उनकी बहुत इज्जत थी, मिलनसार थे, दोनों सब की मदद के लिये सदैव तैयार रहते थे। इसिलिये ये देख कर सभी आश्चर्य में थे।
पुलिसकर्मियों द्वारा इस तरह ले जाने पर लोगों ने हंगामा खड़ा कर दिया । हर कोई कारण जानने के लिए बेचैन था।
पुलिस का जवाब सुन कर कि ये दोनों अपने घर में सैक्स रैकेट चलाते हुए रंगे हाथों पकड़े गये है। लोगों को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था,सब हतप्रभ थे।
जिन लोगों को अभी तक गुप्ता दम्पत्ति पर दया आ रही थी, अब उन्हीं की आंखों में घृणा झलक रही थी। सब के मन में बस अब एक ही प्रश्न था-
- 'वो कौन सा कारण था जिसने सज्जन और सभ्रान्त दिखने वाले बुजुर्ग दम्पत्ति को कीचड़ भरी गन्दी राहों पर भटकने के लिये मजबूर किया था।
सुनीता त्यागी

फुर्सत में मां नहीं -------------------बड़ी मुश्किल से शोभनाथ के घर मोबाइल खरीदा गया था। एक-एक पाई बचा बचाकर। कई सालों स...
03/02/2025

फुर्सत में मां नहीं
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बड़ी मुश्किल से शोभनाथ के घर मोबाइल खरीदा गया था। एक-एक पाई बचा बचाकर। कई सालों से सपना था कि घर में स्मार्ट फोन नहीं है होना चाहिए। यही सोंचकर स्मार्ट फोन लिया गया। आधा पैसा, माँ ने बचा बचा कर रखा था। बेटे की खुशी के लिए दे दिया।
मोबाइल आते ही घर में खुशी आ गयी। सब लोग खुश। माँ भी बेटे की खुशी देखकर खुश है। शोभनाथ के सारे बच्चे खुश थे। पत्नी भी यह सोचकर खुश थी कि सेल्फी लेगी। बच्चे खुश थे कि कार्टून देखने को मिलेगा। सभी ने मोबाइल उलट पलट कर देखे। अच्छा है।
बच्चों ने नानी से वीडियो कालिंग बात की। बच्चों की मां भी पीछे नहीं थी। शोभनाथ भी अपनी सासु से बात की। सासु खुश थी। दामाद जी कमाने लगे हैं। बेटी के लिए अब तेल,लिपिस्टिक, क्रीम,, साबुन आदि के लिए दिक्कत नहीं होगी।
शोभनाथ की माँ को कोई मोबाइल देखने नहीं दिया। घर में लड्डू आया था। सब लोगों ने खाया। पर माँ के पास लड्डू नहीं पहुंचा। सब अपने में मस्त थे। सबको खुश देखकर माँ खुश थी।
बच्चों की तरह-तरह फोटो खींची जानें लगी। नये-नये कपड़े पहने गये। नये-नये रूप में फोटो खींची गयी। शोभनाथ की पत्नी की भी नये-नये स्टाइल में फोटो खींची गयी। पूरी गैलरी भर गयी।
शोभनाथ की भी नये-नये लुक में फोटो खींची गयी। शोभनाथ की बहन की शादी हो गयी थी। वह भी खुश थी कि माँ की तस्वीर मंगा लेगें। बहन ने भाई से सभी की फोटो भेजने की अपील की। सबकी फोटो भेज दी गयी। बहन ने सारी तस्वीर देखी। उन तस्वीरों में माँ की फोटो तलाशती रही। माँ की तस्वीर नहीं थी।
बहन ने पूछा माँ की तस्वीर नहीं भेजा। माँ की फोटो नहीं थी। चलो भेज दूंगा। कई दिन बीत गये। माँ की तस्वीर नहीं खींची गयी। जब भी खींचने की बात होती तो माँ कभी खाना पका रही होती तो कभी कपड़े धुलती हुई रहती तो कभी खेती बाड़ी में लगी रहती। जानवरो के पानी सानी में। कभी नाती पोतों में। माँ खाली नहीं रहती है इसलिए फोटो नहीं खींची गयी।
बहन ने कहा माँ जो काम कर रही है वही फोटो भेज दीजिये पर माँ की फोटो खींचने की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गयी। बहन को माँ की तस्वीर का इंतजार है। भाई भौजाई को माँ के खाली होने का इंतजार है जैसे माँ घर गृहस्थी के कामों से फुर्सत होगी फोटो खींची जायेगी। न तो माँ फुर्सत में अभी तक मिली न तो फोटो खींची गयी।
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‌‍‌ प्रयागराज

लकीरों में लिखा भविष्यअरूप अंधेरी बालकनी में अकेले बैठे हुए हैं, माँ को गए आज महीना पूरा हो गया। अब जीवन अकेले ही काटना ...
03/02/2025

लकीरों में लिखा भविष्य
अरूप अंधेरी बालकनी में अकेले बैठे हुए हैं, माँ को गए आज महीना पूरा हो गया। अब जीवन अकेले ही काटना है, ये ख्याल उन्हें सताए जा रहा है।
पचास पार जा रही उम्र और अकेलापन,उफ़। माँ थी तो जैसे तैसे कट भी रही थी,पर अब? उन्हें अपने ज्योतिष गुरु जी पर आज बहुत गुस्सा आ रहा था जिनपर उन्हें अगाध भरोसा था, उनकी हर बात पत्थर की लकीर थी जैसे।
उच्च शिक्षा, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा, सब कुछ तो पाया। जिसका श्रेय वे गुरुजी को देते थे। कोई भी काम हो माँ से सलाह बाद में लेते पहले गुरुजी से बात करते और वो जो कहें, सब मंजूर।
बहुत पहले उन्होंने कहा था, तुम्हारी उम्र बयालीस तक है, तुम्हारे खानदान में भी कोई मर्द पचास तक नही रुका। इसलिये जो भी करना चाहते हो सब हासिल कर लो, राजयोग है लकीरों में।
सब हासिल किया पर शादी नही की। लगा क्यों किसी की जिंदगी खराब करना जब ज्यादा जीना ही नही। माँ समझा कर थक गई, गुरुजी ने भी कहा, पर जैसे प्रण कर लिया था नही तो नही।
उम्र के साथ रिश्ते आने बन्द हो गए। किसी पर कभी दिल भी नही आया, क्योंकि उसे सात तालों में बन्द जो कर रखा था।
माँ अक्सर कहती थी, किसी पर विश्वास करना अच्छी बात है पर अंधविश्वास नही करना चाहिये। ऊपर वाला क्या सोचता है किसी को पता नही होता। तू शादी कर ले और उनके हाथों छोड़ दे सब। जो होगा अच्छा होगा। मगर नहीं तो नहीं।
आज उन्हें सब याद आ रहा है, गुरुजी का ज्ञान, माँ की सीख, अपनों की सलाह। एक उम्र के बाद अकेलापन, मौत से भी बदतर लगता है। शायद इसीलिये पति पत्नी के रिश्ते को बनाया गया होगा। उन्हें किसी के कंधे पर सर रखकर रोने की तीव्र इक्छा हुई अनायास। अंधेरे में उनका हाथ अपने ही कंधे पर चला गया।
©संजय मृदुल

*लाल इश्क का इंतजार* फलक फेसबुक लघुकथाएंमुझे उससे बहुत, प्यार था दिल में खुमार था, उस पर न्योछावर हो जाने के लिए दिल कुर...
03/02/2025

*लाल इश्क का इंतजार*
फलक फेसबुक लघुकथाएं
मुझे उससे बहुत, प्यार था
दिल में खुमार था, उस पर न्योछावर हो जाने के लिए दिल कुर्बान था
बहुत जतन किए कि कोई और उसे, मुझसे ना छीन ले!
पर वह निर्दई था या बेगैरत... जो उसे मुझसे छीन ले गया
सुर्ख लाल लिबास की खूबसूरती... उस सा, ना कोई दूजा, सच बात कही है मैंने, नहीं यह कोई झूठ या धोखा!
सुबह से सांझ, देख देख कर उसे था मै निरखता,जो कि लगता था दूजो को अजूबा !
उसका यूं हिलना, झूमना..
मैंने प्यार के तो, कई तराने थे उस संग गाए!
आता जाता कोई भी, मुझे यूं उसके पास, खड़े देख भी मुस्कुराए!
सच, संग मेरा उसके साथ खड़े होना..ही, बहुतो को नहीं था लुभाता!
पर मैं क्या करूं मुझे तो उसके बिना कुछ भी नहीं था सुझता
हवा के झोंके से उसका इठलाना, आसपास की सुर्ख अप्सराओं से उसका कहीं ज्यादा ही, बेहतरीन सुंदर रूप के रूप में दिख जाना!
क्या करूं?
किसी काम में मन भी नहीं लगता था
सांझ ढले, दिया बाती, लोग करें पर मैं उसको निहारु ना तो, चैन ही ना मिले!
हाय रे ..यह क्या !!
दिल को जोर से झटका लग गया, करंट जोरो का था
कोई मेरी प्यारी माशूका को मुझसे, छीन कर ले गया
उसके लिबास की टूटी पत्तियां जमीन पर पड़ी थी
पूरा का पूरा गुलाब ही ले जाता, यूं उसके अस्थि पंजर तो ना छोड़ जाता ,पूरे आंगन में हरी लाल पत्तियां उड़ उड़ कर फैल रही थी
वो,एक अकेला ही, पूरे गुलदस्ते जितना बड़ा था
छू, छू कर कांटे रो रहे हैं हम!
वह मेरा सुर्ख लाल गुलाब था उसके जाने का सच में मुझे बेहद मलाल था
कमबख्त.. छोटी कलियां भी साथ ले गया
यह तो और भी गहरा आघात था तस्वीर खींच कर रखी थी तड़के ही, अब तो आह भी वही वाह भी वही!
एक लंबा इंतजार ही सही!
नई कलियों, फूलों के साथ फिर से बगिया में,मुस्कान आएगी
इतना छुपा कर रखेंगे, कि दिल की धड़कन भी ना जान पाएगी
लेखिका अर्चना नाकरा
(हास्य कहानी)
बहुत जतन से पेड़ पौधों को पाल पोस कर बड़ा करो, उनके फूलों को निहारो! पर,कोई बिना मांगे अचानक,तोड़ कर ले जाए तो जो दिल में आया बस वही लिख डाला...

मन्नत के धागे"हेल्लो रीना...हेल्लो हेल्लो""हाँ माँ क्या हुआ ..सब ठीक तो है नआप इतनी घबराई हुई क्यों हैं??"मा…"रीना तू बस...
03/02/2025

मन्नत के धागे
"हेल्लो रीना...हेल्लो हेल्लो"
"हाँ माँ क्या हुआ ..सब ठीक तो है न
आप इतनी घबराई हुई क्यों हैं??"
मा…"रीना तू बस जल्दी से घर आजा.. तेरे भाई की तबियत फिर से खराब हो गयी है। "
रीना उस समय अपनी बेटी के साथ माल में शॉपिंग कर रही थी।उसकी बेटी का कनाडा का वीज़ा लग गया था और दोनो उसी की तैयारियों में व्यस्त थी।
रीना बेटी को घर जाने को बोल कर जल्दी से टैक्सी ले कर माँ के घर पहुंची। देखा तो भाई उल्टियां पे उल्टियाँ करे जा रहा था।हाथ पैर कांप रहे थे। अपने पैरों पर खड़ा नही हो पा रहा था। दोनो माँ बेटी मुश्किल से उसको ले कर अस्पताल गए।
डॉक्टर ने जाते ही इमरजेंसी में दाखिल कर दिया और जाते ही तीन चार इंजेक्शन ड्रिप में दिए और उनको बताया कि अब वो ठीक है। उसने माँ को घर भेज दिया खुद भी कुर्सी पर पीठ लगा कर बैठ गयी और सोच में पड़ गयी कि माँ को इस बेटे के रूप में ना जाने कौन से कर्मों की सजा मिल रही थी।
रीना की माँ अपने समय मे बेहद खूबसूरत हुआ करती थी और एक मध्यम परिवार की बेटी थी। उसकी खूबसूरती और पढ़ीलिखी होने की वजह से उसके लिए बहुत अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे थे और शहर के एक रईस परिवार में उसका ब्याह हो गया। शादी के बाद उसके शाही ठाठ थे ।आगे पीछे नोकर घूमते थे। माँ को कभी घर का कोई काम नही करना पड़ता था।
शादी के बाद चार सालों में ही उसके घर दो प्यार- प्यारी बेटियां आ गयी। वो भी बहुत लाड़ प्यार से पलने लगी।लेकिन दोनो को एक बेटे की कमी बहुत ज्यादा महसूस होती थी।बेटे की चाह में दोनो ने बहुत जगह मन्नतें माँगी, पूजापाठ व्रत जो भी किसी ने बताया सब किया और आखिर भगवान ने सुन ली ।छोटी बेटी पांच साल की थी जब बहनो का भाई भी आ गया।
भाई को घर पर कुछ जरूरत से ज्यादा ही लाड़ प्यार मिलने लगा।
उसके मुँह से निकली हर बात पत्थर की लकीर होती । उसकी गलत सही हर मांग को पूरा किया जाता। उनके पापा ने बहुत बार सबको ये समझाने की कोशिश की कि इस तरह तो ये बिगड़ जाएगा लेकिन किसी ने उनकी नही सुनी।
एक दिन कुछ ऐसी अनहोनी घटी कि पापा सुबह बाथरूम गए तो बाहर ही नही आये ।उनको दरवाजा तोड़ कर बाहर निकाला गया। ब्रेन हैमरेज की वजह से उनकी वहीं पर मृत्यु हो गयी थी।
पापा के जाने के बाद भी भाई को कोई फर्क नही पड़ा। वो सबके ऊपर हावी हो कर अपनी गलत सही सब मांगे मनवाता रहता और माँ उसके प्यार में अंधी हो कर उसकी हर मांग को पूरी करने में जुटी रहती।
पापा तो चले गए थे लेकिन वो माँ के लिए इतना कुछ छोड़ कर गए थे कि माँ अभी भी शाही ज़िन्दगी जी रही थी। दोनो बेटियों की शादी के बाद जब बेटे की शादी की बारी आई तो तब भी उसने अपनी पसंद की लड़की से ही शादी की।
माँ ने सोचा चलो शादी के बाद शायद बेटा सुधर जाएगा।लेकिन जो लड़की ब्याह के आयी थी वो उसको सुधारने वाली नही बल्कि और भी बिगाड़ने वाली थी क्योंकि वो भी एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद थी।
और फिर वो ही हुआ जिसका सबको डर था। पैसे वाले का बेटा होने की वजह से उसके सब दोस्त भी पैसे वालों की बिगड़ी औलाद थे और एक दिन रात को दोस्तों के साथ शराब पीकर ड्राइविंग करते हुए उसका बहुत भारी एक्सीडेंट हो गया।
दिमाग पर बहुत ज्यादा चोट लगने की वजह से वो कोमा में चला गया।तब भी माँ ने उसको ठीक कराने में अपना दिन रात एक कर दिया।जब तक वो कोमा से वापिस आया लाखों रुपये हॉस्पिटल वालों की भेंट चढ़ चुके थे। माँ की तपस्या और दुआओं के फलस्वरूप भाई बच तो गया लेकिन दिमाग की चोटों की वजह से वो अपना दिमागी संतुलन खो बैठा । उसको खुद के खाने पीने नहाने ,शौच जाने किसी भी चीज का कुछ होश नहीं था। उसकी इस हालत को देखकर वो लड़की भी उसको छोड़ कर चली गयी जिसके साथ उसने प्रेम- विवाह किया था।
धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार होने लगा लेकिन जब तक उसको होश आया उसका सब कुछ लुट चुका था। उसकी पत्नी अपनी बेटी को साथ ले कर उसको छोड़कर जा चुकी थी और किसी भी कीमत पर वापिस आने को तैयार नही थी और फिर उसने तलाक के लिए कोर्ट में पेपर फ़ाइल कर दिए।
भाई ने जब खुद को इस हालत में देखा तो धीरे- धीरे फिर से शराब पीनी शुरू कर दी और इतनी ज्यादा पीने लगा कि उसको खुद को पूरी तरह शराब में डुबो दिया ।
आज ये हालात हैं कि माँ के पास उसको शराब में देने के लिए पैसे नही बचे। अगर वो नही देती तो वो छीन लेता है और फिर भी नही मिलें तो माँ के ऊपर हाथ भी उठाता है जान से मारने की धमकी भी देता है।मोहल्ले वाले उसकी इन आदतों की वजह से उसको कई बार जेल भेज चुके हैं।
लेकिन माँ उसको फिर से छुड़ा के ले आती है। शराब की अति के कारण अब उसकी किडनियां लीवर सब प्रभावित होने लगे हैं। डायबिटिक होने के साथ साथ उच्च रक्तचाप का मरीज भी हो चुका है। रोज रोज उसको ले कर डॉक्टर पास भागना पड़ता है।
रीना की बड़ी बहन मीना दूसरे शहर में है और ससुराल में उलझी है इसलिए माँ के पास हर बार रीना को बुलाने के इलावा कोई चारा नही है।
वो खुद इस समय उलझन में फंसी है क्योंकि उसके पति और बेटा पहले ही कनाडा में सेटल हो चुके हैं और उसको भी बुला रहे है क्योंकि वो बेटी की वजह से रुकी हुई थी और अब तो बेटी भी कुछ ही दिनों में जा रही थी लेकिन उसको समझ नही आ रहा था कि वो माँ को इस हालत में छोड़ कर कैसे जाए।
इन्ही सब बातों को सोचते सोचते रीना को समय का पता ही नही चला जब नर्स ने आकर आवाज लगाई "मैडम आपका ध्यान कहाँ है मरीज की ग्लूकोज़ की बोतल खत्म हो गयी है ।कहते कहते नर्स ने भाई की बोतल बदल दी और वापिस दूसरे मरीज के पास चली गयी
और रीना इसी उलझन में डूबी थी कि माँ की तपस्या में कहाँ कमी रह गयी थी क्या उन्होंने ऐसे बेटे के लिए मन्नतें मांगी थी जिसने इस उम्र में उनका जीना दुश्वार कर रखा था। ज़िन्दगी के जिस पड़ाव पर आकर लोग सकून की ज़िंदगी जीते हैं और तीर्थ पर जाते हैं माँ इस बेटे की वजह से पल पल मर रही थी और हर दिन खून के आंसू रो रही थी। इससे अच्छा तो भगवान उनको बेटा ना ही देता।
फलक एवम स्वलिखित

लघुकथा- -लायक-नालायक **************************                                           "रामनारायण जी क्या हो रहा है" ...
03/02/2025

लघुकथा- -लायक-नालायक
**************************
"रामनारायण जी क्या हो रहा है" कहते हुए प्रभुदयाल जी ने रामनारायण जी के घर में प्रवेश किया। रामनारायण जी बोले -
-सुबह -सुबह कुछ बुखार सा महसूस कर रहा था इसलिए पार्क में टहलने नहीं आ पाया आज। प्रभु जी बोले -
-"वही मैं सोच रहा था कि बिना किसी ख़ास कारण के आप पार्क आना नहीं छोड़ेंगे। ये तो आपका वर्षों का नियम है।"
राम जी ने पैर दबाते हुए अपने बेटे कहा बेटे बहू के हाथ से दोचाय और नाश्ता भिजवा देना। बेटा, जी बाबूजी कह कर चला गया। उसके जाने के बाद प्रभु जी बोले- "ये आपका छोटा बेटा सिंचाई विभाग में क्लर्क है न ?" राम जी बोले -
-हाँ जी। तभी प्रभुजी बोले -
- "आपके दोनों बड़े बेटे तो बहुत काबिल निकले। एक अमेरिका में है और दूसरा लन्दन में है। दोनों शानदार कमाई कर रहें हैं हुए बढ़िया जीवन जी रहें है। दोनों बहुत ही लायक निकले।" राम जी बोले -
-"अपने-अपने सोचने का ढंग है।" प्रभु बोले -
- "इसमें सोचना क्या है? सब चीजें साफ़ हैं।" राम जी बोले -
-"जब मेरी श्रीमतीजी गुजरी तो दोनों ही बेटे अपने जरूरी प्रोजेक्ट में व्यस्त होने के
नहीं कारण आए। बड़ा बेटा अपनी मां के अंतिम दर्शन और मुखाग्नि देने तक नहीं आया। छोटे बेटे ने ही सारी विधियां पूरी की। दोनों बेटों ने सब ऑनलाइन देख कर श्रद्धांजली दे दी। जीवन काल में तो वे दूर रहे ही निधन पर भी नहीं आ सके।जबकि छोटा बेटा और बहू दिलो जान से सेवा करते रहें हैं। साधन सीमित हैं पर पर्याप्त हैं। अब आप ही बताएं कि कौन लायक है और कौन नालायक?
प्रभुदयाल जी को राम जी ने अवाक् कर दिया।
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श्याम आठले (ग्वालियर,म-प्र )
स्वरचित /मौलिक

साया (लघुकथा) "अरे ऐसे नहीं भागा करते गिर जाओगी और फिर तुमको चोट लग जायेगी । "आदिल ने शाजिया को प्यार से उठाकर अपने गले ...
02/02/2025

साया (लघुकथा)
"अरे ऐसे नहीं भागा करते गिर जाओगी और फिर तुमको चोट लग जायेगी । "
आदिल ने शाजिया को प्यार से उठाकर अपने गले से लगाते हुए कहा।
"फिल क्या हो जायेगाअब्बू? " छोटी सी शाजिया की तोतली जुबान ने जैसे हजारों संगीत के शाज छेड़ दियों हों ।
"फिल क्या होगा... अब्बू लो जायेंगे। " आदिल ने भी तोतली जुबां में झूट मूट रोते हुए कहा तो शाजिया खिलखिला कर हंस पड़ी।
"अब न लोओ अब्बू... हम नहीं गिरेंगे। "शाजिया ने मासूमियत से कान पकड़ते हुए कहा तो आदिल ने उसे अपने सीने से लगा लिया और प्यार से उसका सिर सहलाने लगे।
हिना बाप बेटी की पाक मोहब्बत देखकर भावुक हो गई कब आँखों की कोर से आँसू बह निकले पता ही नहीं चला।
उसने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला और अब्बू की तस्वीर आँखों में उतर आई।
"अब्बू हम आपको कभी नहीं भूल पाएंगे। अभी तो माँ ही बने हैं दादी नानी जो भी बनेंगे और जब भी किसी को बेटी को दुलारते हुए देखेंगे आपकी याद आयेगी।
आपका साया हमेशा हमारे साथ रहेगा ।"
"हिना क्या हुआ... सब खैरियत तो है? " आदिल ने उदास बेगम से पूछा तो वह मुस्करा भर दी।
साये सिर्फ महसूस किये जा सकते हैं।
राशि सिंह
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
(मौलिक लघुकथा)

आक्सीज़नबालकनी में आते ही हरे भरे पेड़ों के बीच शिवम के शरीर में जैसे भरपूर उर्जा का संचार हो गया।उसकी नज़र एकबारगी गमलों म...
02/02/2025

आक्सीज़न
बालकनी में आते ही हरे भरे पेड़ों के बीच शिवम के शरीर में जैसे भरपूर उर्जा का संचार हो गया।उसकी नज़र एकबारगी गमलों में लगे सब पेड़ो को प्यार से सहला गई।एक लंबी साँस भर के वो वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गया।
तभी एक खड़खड़ाहट के स्वर से उसकी नज़र नीचे सामने सोसायटी के गेट पर पड़ी।कोई अपनी कार से आक्सीजन सिलेंडर निकाल रहा था।शायद किसी की आक्सीजन कम हो रही होगी… या फिर ऐहतियातन….क्योंकि कोविड महामारी ने इस बार जो पूरे देश में तांडव मचाया है उससे सभी बेहद डरे हुए हैं… और इससे पहले की कोविड उन पर आक्रमण कर उनकी साँसों की रफ़्तार कम करे वो कृत्रिम साँसें सँजो के रख लेना चाहते हैं।
इस बीस मंज़िला इमारत के आठवें माले पर स्थित चार बैडरूम वाले इस फ्लैट में यूँ तो हर कमरे के बाहर बालकनी थी पर हरियाली सिर्फ शिवम के कमरे के बाहर थी।क्योंकि घर के बाकी लोगों को न तो पेड़ लगाने की फुर्सत थी और न शौक।
शिवम की नज़र अचानक गमले मे चीकू के पेड़ पर अटक गई जहाँ दो नन्हे नन्हे चीकू लटक रहे थे।उसके चेहरे पर ममता भरी मुस्कान खेल गई।और एक झटके से उसके ख़यालों में अपना बागीचा घूम गया जहाँ हर तरह के फलों के पेड़ लगे थे...और सब्जियां भी भरपूर पैदा होती थीं।उसकी पत्नी मँगला अपनी निगरानी में माली दादा से सब काम करवाती थी।पिताजी ने सस्ते के ज़माने में थोड़ा शहर से दूर ये बहुत बड़ा प्लाट खरीदा था जिस पर आधे में मकान था और आधे में बाग।शिवम के बड़े भाई बहुत पहले साउथ अफ्रीका में नौकरी कर वहीं बस गए थेऔर अब उनका इधर आने का कोई इरादा नहीं था।अतः माँबाप की मृत्यु के बाद पूरे बंगले में शिवम का ही परिवार बसा था।तीनों बच्चों और उनके दोस्तों से बंगला गुलजार रहता था।अल् सुबह ही तरह तरह की चिड़िया भी पेड़ों से चींचीं करती हर डाली पर झूलती थीं।
पर वक्त बदला… बच्चे बड़े हुए और बेटों की शादी हो गई।एक का अपना कम्प्यूटर का बिज़नेस था..और दूसरा उसी शहर में आयकर विभाग में अकाउंटेंट था। इसलिए दोनों पिता के साथ ही रहते थे।लड़की शुभा ब्याह कर विदेश चली गई।बस इसके बाद ही दोनों बेटों को इस बंगले को बेचने की ज़िद सवार हो गई।एक तो इतनी बड़ी ज़मीन और वो भी शहर की घनी आबादी से थोड़ा हट के...बस इसी कारण कुछ फैक्ट्री वाले और कुछ सोसायटी बनाने के इच्छुक बिल्डर्स उन पर ज़्यादा पैसों का लालच दे दबाव बना रहे थे।इस बाबत बेटों को भी अब वो बंगला पुराने स्टाइल का लगने लगा और बहुओं को भी कमरे छोटे लगने लगे।शिवम तो कुछ कह नहीं पाया पर मँगला ने साफ कह दिया कि उसके जीते जी ये बंगला जो उसके ससुर की निशानी है नहीं बिकेगा।
"ये सारे पेड़ मेरे देवर ननदों की तरह हैं.. जिनसे अपने ब्याह के बाद से ही मैं अपने सारे दुख सुख बाँटती आई हूँ… और इन्होंने मेरा हर वक्त साथ दिया।ताज़ी हवा से लेकर ताज़े फल फूल.. हरी सब्जियां… सुंदरता.. क्या नहीं दिया इन्होंने… और आज कुछ पैसों के लालच में हम इन्हें कटने के लिए कसाई को सौंप दें..?फिर पैसों की कोई ऐसी मजबूरी भी नहीं है।"
"पर माँ…,"बड़े बेटे राहुल ने माँ की इस भावात्मक दलील पर कुछ कहना चाहा जिसे मंगला के कठोर स्वर ने बीच में ही काट दिया,
"जिसको ये घर पसंद नहीं वो यहाँ से जा सकता है"।
हमेशा से शांत स्वभाव के शिवम मन ही मन मंगला के इस आदेश से बहुत खुश थे ..पर उनकी ये खुशी ज़्यादा दिन नहीं रही...दो साल बाद ही अचानक ही हृदयाघात से मंगला चल बसी और उसके जाते ही लड़के फिर उस पर दबाव डालने लगे थे।
"पापा… अब अपनी उम्र भी देखिये… कभी भी बीमार पड़ सकते हैं.. यहाँ से अस्पताल डाक्टर सभी तो इतना दूर हैं कि जाते जाते ही देर हो सकती है।"
छोटे की अपनी दलीलें थीं… वो चाहता था शहर के बीच में एक आधुनिक साजसुविधा युक्त बड़ा मकान लेंलें।और जो पैसा बचे उसमें से कुछ उसको अपने बिज़नेस में मदद हो जाएगी।
बेटों की ज़िद के आगे झुक गए थे शिवम और एक वर्ष पहले ही इस सोसायटी में जहाँ गगनचुंबी इमारतों का जंगल उगा हुआ था आठवीं मंज़िल पर ये चार बैडरूम का आधुनिक सुविधाओं से युक्त फ्लैट उन्होंने खरीद लिया।और आननफानन में फैक्ट्री लगाने की ख़्वाहिश में फैक्ट्री मालिक ने उस बंगले पर बुलडोज़र चला कर सब धराशायी कर दिया।
पर इससे पहले कि वो लोग इसका कुछ जश्न भी खुल कर मना पाते कोरोना माहमारी का आगमन हो गया।पूरे एक साल सब उस दड़बे नुमा फ्लैट में बंद रहे।शिवम को अब रह रह कर अपना घर याद आता जहाँ वो अपने बागीचे में आज़ादी से बिना वायरस के भय के घूम सकता था।
उस घर से आते वक्त वो अपने साथ अपने बागीचे में रखे कुछ गमलों को ले आया था जिसे उसने अपने कमरे की बालकनी में सजा दिया था।और पिछले वर्ष लाकडाउन के वक्त उसका उन्हीं पेड़ों के रखरखाव मे अच्छा समय बीता।
और आज कोरोना की दूसरी भयंकर लहर के बीच उसकी बालकनी में तुलसी,पीपल, गिलोय, नीम,अजवाइन,चीकू,आम,पपीता...और भी कितने ही पेड़ लगे हैं जो टीवी में आक्सीजन के लिए ज़रूरी बताए जा रहे हैं।सुबह शाम वो यहीं बैठता है और भरपूर स्वस्थ है।
इसके विपरीत उसके दोनों बेटों ने अपने अपने कमरों में मंहगे दामों में खरीद कर एक एक आक्सीजन सिलेंडर रख रखा है… न जाने कब ज़रूरत पड़ जाए।
"पापा… मैं सोचता हूँ..दो आक्सीजन सिलेंडर और खरीद लूँ...बढ़ती कमी के साथ हर रोज़ मँहगे होते जा रहे हैं...पता नहीं कब…",बड़ा बेटा सोमेश अभी अभी उसके पास आ कर भयमिश्रित स्वर में बोल रहा था...और उनके मुख पर एक दबी दबी व्यंग्य मिश्रित मुस्कान फैल गई थी…'प्राकृतिक आक्सीज़न मुठ्ठी भर पैसों में बेच कर अब कृत्रिम आक्सीजन कितनी खरीद पाओगे',भीतर ही भीतर उनके होंठ बुदबुदाए।
मंजू सक्सेना

मदारी ***** मदारी का तमाशा चल रहा था।वह अपने पिटारे से कभी ढेर सारे रुमाल निकाल कर लहराने लगता, तोअगले ही पल उस रुमाल से...
02/02/2025

मदारी
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मदारी का तमाशा चल रहा था।वह अपने पिटारे से कभी ढेर सारे रुमाल निकाल कर लहराने लगता, तोअगले ही पल उस रुमाल से कबूतर बनकर फड़फड़ाने लगता, और कभी उसके हाथ का खाली लोटा पानी से भर जाता।
सारे बच्चे विस्मित नजरों से देखते हुए खुश हो रहे थे, तालियां बजा रहे थे।
खेल खत्म हुआ, सभी बच्चे अपने अपने घर से मदारी के लिए पैसे लेने चले गए, लेकिन एक छ: सात साल का बच्चा जिज्ञासु नजरों से वहीं खड़ा मदारी को देखता रहा।
" क्या बात है! तुम नहीं गये बेटा , जाओ तुम भीअपनी मां से कुछ ले आओ "।
सुन कर बच्चा उदास हो गया, उसकी आंखे नम हो गयीं।
"नहीं! मेरी माँ नहीं हैं,किससे मांगू पैसे ? "
फिर वह कुछ पल चुपचाप मदारी को सामान समेटते हुए देखता रहा, और फिर मासूमियत से बोला " एक बात पूछूँ मदारी बाबा "।
" हां जरूर पूछो बेटा "।
" क्या तुम अपने पिटारे से कुछ भी निकल सकते हो " ।
" हां! मेरे पिटारे से कुछ भी निकल सकता है , बताओ तुम्हें क्या चाहिए "मदारी ने बच्चे का दिल रखने के लिये यूं ही बोल दिया।
" तो क्या तुम इसमें से मेरी मां भी निकाल सकते हो "।
बच्चे का सवाल सुन मदारी अवाक् रह गया। इस प्रश्न का उत्तर तो उसके पिटारे में भी नहीं था।
सुनीता त्यागी मेरठ

बुलंदी की ओर बिटिया-------------------------घर में खुशियाँ मनाई गयी। मिठाइयां बांटी गयी। सोहर कराया गया। कन्या खिलाया गय...
02/02/2025

बुलंदी की ओर बिटिया
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घर में खुशियाँ मनाई गयी। मिठाइयां बांटी गयी। सोहर कराया गया। कन्या खिलाया गया। दान दक्षिणा गरीबों को दिया गया जब मुकुन्दलाल को बिटिया पैदा हुई थी। बहुत खुश थे मुकुन्दलाल। सुंदर कन्या का जन्म हुआ था। गोरी चिट्टी। मुकुन्दलाल को जैसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो। सच में जब बिटिया घर में जन्म लेती है तो लक्ष्मी का आगमन होता है।
कुछ लोग दबे जबान से कह डाला पराये घर की चीज होती है आज है कल किसी की अमानत हो जायेगी। चिंता करने की कोई जरूरत नहीं। कुछ लोगों को सोहर कराना गले से नहीं उतर रहा कि सोहर तो लड़के के जन्म पर होता है। कुछ तो कहे नाहक़ ही बिटिया के जन्म पर मिठाई बांटे। आखिर बिटिया की शादी ब्याह पर बहुत खर्च होता है। इस तरह मिठाई बांटना उचित नहीं। आगे चलकर बिटिया के लिए दिक्कत हो सकती है। यह सारी खुशी अपशकुन होती है लेकिन मुकुन्दलाल बेटी के जन्म पर बेहद खुश थे।
अब बिटिया चार-पांच माह की हो गई है अब बिटिया मुश्कराने लगी है। ऐसी खूबसूरत बिटिया आस-पास किसी को न थी। कई बार तेल मालिश की जाती। काजल लगाया जाता है ताकि बिटिया को किसी की नजर न लगे। बिटिया का मुखमंडल देखकर मुकुन्दलाल फूले नहीं समाते। बिटिया के साथ जीभर खेलते। बाल मनुहार करते।
सहज कोमल मुस्कान देखकर आसपास की औरते भी बिटिया के साथ मन बहलाने चली आती। जीभर कर बिटिया की मुश्कान पर मां खुश एवं मोहित रहती। जब बिटिया को मां आंचल से ढक कर दूध पिलाती तो मां की आंखे बिटिया के दुग्धपान से मदहोश हो जाती है। ऐसी बिटिया जिसके घर हो जाती है तो घर का घरेलू कलह शान्त हो जाता है। दया, उदारता, प्रेम, स्नेह एवं मधुर भाव स्वयं पनपने लगता है।
बिटिया घर की चांदनी होती है जिस घर में बिटिया होती है। वह घर खूबसूरत हो जाता है। मन प्रसन्न रहता है। बिटिया घर को कायदे से संभालती है। साफ सफाई का ख्याल बिटिया ही तो करती है। अच्छा-अच्छा व्यंजन बनाने में माहिर होती हैं। अच्छा स्वादिष्ट खाना बिटिया ही परोस सकती है।
मुकुन्दलाल की बिटिया का नाम अनुराधा रखा गया।बिटिया के लिए तरह-तरह खेलने के लिए खिलौने दिये गये। बिटिया की परवरिश में कोई कोर नहीं छोड़ा जा रहा है। धीरे- धीरे बिटिया बडी़ हो रही है। उसकी हर जरूरत पर ध्यान दिया जाने लगा है। बिटिया के अलावा मुकुन्दलाल को कोई औलाद और नहीं हुई। बिटिया ही उनकी सबकुछ है। बिटिया को बड़े नाजों से पाला जा रहा है।
कोई कहीं से आता,अनुराधा के साथ खेलना शुरू कर देता है। उसकी तोतली बातेँ लुभावनी होती है। अब वह बड़ी हो रही है। घर के आसपास खेलती रहती है। मिट्टी लगाये जब खेलती मिल जाती तो बहुत ही खूबसूरत दिखती। कभी कभी भी खाती मिल जाती। इस तरह की बाल छवि देखकर सभी लोग खुश रहते।
मुकुन्दलाल की बिटिया उस परिवार की केन्द्र बिन्दु है। सब लोग बाल मनुहार करते रहते हैं। इस तरह से ऐसी सुंदर बिटिया पाकर पूरा परिवार मस्त है। बिटिया सचमुच कोई थका हारा हो अगर बिटिया के साथ खेल ले तो थकान सचमुच खत्म हो जाती है।
मुकुन्दलाल चाह रहे हैं कि बिटिया मेरी पूरी दुनिया में नाम करे। इस तरह से बिटिया का एक अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया गया। कोचिंग की व्यवस्था की गयी। हर तरह की शिक्षा के साथ संगीत सीखने की व्यवस्था की गयी ताकि वह छोटी अवस्था से ही संगीत के मर्म को समझ सके।
अब धीरे- धीरे वह निपुण होने लगी। होनहार बिटिया को पाकर सभी लोग फूले नहीं समा रहे थे। एक प्रतिभाशाली लड़की थी जो भी याद करने को दिया जाता वह झट से याद कर लेती। अध्यापक लोग भी उसकी प्रशंसा करते कि यह होनहार लड़की पूरी दुनिया में अपना नाम रौशन करेगी।
मुकुन्दलाल ने जिस तरह से अपनी बेटी को शिक्षा दिला रहे हैं। आसपास के लोगो में ईर्ष्या घर कर गई। क्यो इतना पढ़ा लिखा रहे हो। पराये घर की अमानत होती है ंं बेटियां। इस तरह से सुविधा सम्पन्न में रखना उचित नहीं। कल किसी के साथ भाग परा गयी तो मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे।
बेटियों को थोड़ा बहुत तालीम दे दो बहुत है। नाम गाँव लिखना आ गया वही काफी है। डिप्टी कलेक्टर बन जायेगी तो चूल्हा चौका कौन संभालेगा। लड़का चूल्हा चौका थोड़ी संभालेगा। कुछ लोग सहमत रहे कि जो काम लड़के नहीं कर पाते हैं वह काम लड़कियां आसानी से कर लेती है ं। आजकल की लड़कियां किसी से कम नहीं है ं।
अब अनुराधा जवान हो चली है। बेहद खूबसूरती लिए अनुराधा किसी सौन्दर्यवती स्त्री की तरह मनमोहक लग रही है। संगीतमय अंदाज में लहरा कर चलती अनुराधा सबका मन मनमोह लेती है। अनुराधा की आवाज में जो खनक है वह हृदय की गहराइयों को बेध देती है। आनन्द की अनुभूति रोम-रोम में सिहरन सी दौड़ जाती है।
एक बेहद करीब आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की ओर अनुराधा का गीत संगीत ले जाता है। बिल्कुल निश्चल प्रेम प्रस्फुटित करके एक स्थायी रोमांस पैदा करता है। अनुराधा जब भी अपनी संगीत देती पूरा माहौल संगीतमय हो जाता। अनुराधा की संगीत सुनकर सूरज को कायल बना दिया। हर वक़्त अनुराधा का संगीत गुनगुनाता रहता। उस युवक केे ह्रदय में अनुराधा के प्रति प्रेमभाव जागृत हो गया।
एक कार्यक्रम में अनुराधा का मनमोहक गीत संगीत चल रहा था। संगीतमय माहौल बना था। पूरी महफ़िल सजी थी। मंत्रमुग्ध खचाखच भरा पंडाल झूम रहा था। गाते- गाते अचानक से अनुराधा को चक्कर आ गया और स्टेज पर गिर गयी। आनन फानन में हास्पिटल में भर्ती कराया गया। खून की कमी थी। उस वक्त खून की तत्काल जरूरत थी। कोई उस वक्त खून देने को तैयार नहीं था।
सूरज उस वक्त वहाँ पर मौजूद था। उसने खून देने की पेशकश की। खून देने के कुछ देर बाद अनुराधा को होश आया। आंखे खुलते ही पहली नजर सूरज को देखा। जैसे आंखे खुली सूरज बहुत खुश था। हल्की मुस्कान के साथ सूरज ने अनुराधा से हालचाल जाना। अनुराधा सिर हिलाकर ठीक होने की सहमति प्रदान की। अनुराधा को बताया गया कि इस सूरज के कारण आज खून उपलब्ध हो सका। आज तुम्हारे जीवन की पहली किरण दे ‌‌दिया।
सूरज को पहली बार प्रेम भरी निगाहों से देखा। संगीत के सिवा प्रेम का पहला एहसास अगर हुआ तो सूरज को देखकर हुआ। सूरज ने अनुराधा को बताया कि उसके संगीत को सुनकर वह भावविभोर हो जाता है। हृदय तल में संगीत की किलकारियां गूंजने लगती है। तुम्हारी संगीत में जो ताकत है वह मेरे प्रेम भाव को जगा देता है। सचमुच तुम्हारे संगीत को मैं भूल नहीं सकता हूँ।
अनुराधा का गीत संगीत पूरी दुनिया को मुरीद कर दिया था। बेहद संजीदा। लोगों को मदहोश कर देनेवाला संगीत आज अनुराधा पूरी दुनिया में मशहूर हो गयी थी। सूरज द्वारा लिखे एक प्रेमगीत को अनुराधा ने अपने स्वर सुरों के माध्यम से रातोंरात बुलन्दियों पर पहुँचा दिया। अनुराधा के इस प्रसिद्धि से जो बेटियों को तवज्जो नहीं दे रहे थे। उनका सिर शर्मिंदा से झूक गया था। इस मुकाम पर पहुँची बिटिया को, फूले नहीं समा रहे हैं मुकुन्दलाल।
सूरज और अनुराधा दोनों प्रेम के लौ में अपने प्रेम को एक महान क्षितिज पर पहुँचा दिया। अनुराधा के निवेदन पर माता- पिता सूरज से शादी कराने का फैसला कर लिया क्योंकि सूरज के कारण अनुराधा की जान बच पाई थी। गाँव के जो लोग बेटियों पर शिकंजे कस रहे थे कि बेटियां पराये घर की चीज होती हैं। शिक्षा कोई मायने नहीं रखता। आज उनका सिर शर्म से झुक गया था।
-----जयचन्द प्रजापति "जय'

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