31/01/2022
विपदाओं से लड़कर बदलाव के पथ पर आगे बढ़ता गांव “इनारबरवां”
गांव “इनारबरवां” से बाबा जी की चिट्ठी आई थी। मां चिट्ठी पढ़ कर मुझे देती हुई बोली, बाबा जी तुम्हारे बारे में पुछ रहे हैं। लो पढ़ कर तुम भी जबाब लिख देना। जब मैं उन्हें चिट्ठी भेजूंगी तो साथ में तुम्हारी चिटठी भी पत्र रख दूंगी। मैं खुश हो गई और झट चिट्ठी पढ़ना शुरू किया-बड़की दुल्हिन के साथ शुरू हुआ पत्र, आशीर्वाद और कुशल क्षेम से आगे बढ़ता गया। मेरी इसमें ज्यादा रुचि ना थी। मेरी नजरें तो अपना नाम ढूंढ रही थी।
ये बाबा जी भी ना, अलग से मुझे चिट्ठी ना लिख सकते थे, झल्लाती हुई मेरी नजरें एक लाइन तक पहुंची- “दुल्हिन देखअ का हो ता, ये महीना में फेर से सीलिंग के केस ला पटना जाएके बा।” मैं चकित कि मेरे घर वाले केस लड़ रहे हैं? क्या किया है बाबा जी ने? अब तक कुछ फिल्मों के माध्यम से मैं यह जान गई थी कि केस कोई बुरा काम करने पर ही होता है। मैं परेशान। अब चिट्ठी आगे पढ़ने में रुचि कहां रही? डरी हुई मैं मां को ढूंढने लगी, पर मां तो लंच के बाद ऑफिस जा चुकी थी।
मां का ऑफिस कालोनी में ही एक तरफ था। मैं वहां पहुंच गई। लंच के लिए बाकी स्टॉफ भी इधर-उधर ही थे। मैंने मां से पूछा,”मां बाबा जी पर केस हो गया है,अब क्या होगा?” मां मुस्कुराते हुए मुझे बोली, घबड़ाने की कोई बात नहीं। ये तो जमीन का केस है। कुछ नहीं होगा बाबा जी को। तुम जाओ घर और अपना जबाब लिख कर रखना। कुछ महीनों बाद जब बाबा जी आए तो उनसे मैंने केस के बारे में पूछा। उस वक्त मैं छठी क्लास में थी तो बाबा जी ने मेरे समझने जितना ही मुझे बताया। साथ ही इस किस्से में बाबा जी ने विनोबा भावे का भी जिक्र किया। विनोबा भावे जिन्होंने भूदान आंदोलन चलाया था और इसमें वे सफल भी हुए। भूमि मांगने वे मेरे गाँव भी पहुंचे और मेरे पूर्वजों ने स्वेच्छा से भूमिदान भी किया।
नियति ने मेरी मां को पिता और मां दोनो के रोल के लिए चुना। तीस-बत्तीस की उम्र, माता-पिता, सास-ससुर और पति के प्यार में झूलने वाली लड़की कब पति के गुजरते हीं दो बच्चों के साथ इतनी निडर बन गई कि दुनिया उसकी दुश्मन बन गई।
तब बड़े घर की लड़कियां नौकरी नही करती। समाज क्या कहेगा?
नौकरी की जगह भी ऐसी की आफिस में अकेली महिला। शिव भक्त पर सांपों से डरने वाली मेरी मां कब समाज के सांपों को इग्नोर करना सीख गई ये याद नही। तमाम ऊंच-नीच और फिर भी हिम्मत के साथ दो बच्चों को पालती मां कब समय से पहले बूढ़ी बनती जा रही है इसका भी पता तब नही चला।
समय का चक्र बदलता है और वही बड़ा समाज, परिवार उसे स्वीकार कर लेता है। घर में अब बड़की दुल्हिन लगभग बड़े बेटे की जगह ले चुकी है।
याद है मुझे जब मैं मुहल्ले के दूसरे बच्चे को देख खूब रोई थी कंधे पर सवारी करने को। मां से पूछने लगी कि मेरे पापा कहाँ है? मुझे भी कंधे पर घूमना है।
सुनकर वो शायद अंदर से टूट गई हो पर हिम्मत नही हारी।
बेटी का रोना-पीटना देख शर्मा आंटी उससे कहती हैं, ”बड़ा ज़िद्दी बाड़ी लभली”
पर मेरी मां छः मीटर की साड़ी में लिपटी, दुबली-पतली काया की मालकिन मुस्कुराते हुए कहती है,”आओ हम घुमा दे अपनी बेटी को”
मां बेटी को दुलारते हुए कोशिश करती है कंधे पर बिठाने की कि, पर बेटी पापा की ज़िद किए हुए है।
इसी बीच कोई साधू बाबा मुहल्ले में दक्षिणा लेने आते है। माँ-बेटी को देखते है और कहते हैं, “ मईया कुछ आटा- चावल बाबा के लिए ला दो, भगवान भला करेगा।”
माँ घर में जाती है और एक डिब्बा चावल लाकर साधू बाबा को दे देती है। झोली में चावल रखने के बाद साधू बाबा कहते हैं, ”लाओ मईया हम तुम्हारी बेटी को घुमा देते हैं।”
मां कुछ नही कहती बस मुस्कुराते हुए देख रही है अपनी बेटी को साधू के कंधे पर सवार। बेटी की हँसी माँ के मुँह पर खिल रही है। वो शर्मा आंटी से कहती है, ”मेरी ज़िंदगी में भगवान है शरमाईन, वो ना मेरा और ना मेरे बच्चों का मनोबल कभी नही टूटने देंगे।”
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