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‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत्के सभी शीर्षस्थ क...
20/08/2022

‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत्के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो।भूमिका स्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है। किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है।
इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्व पूर्ण कथाकार महेश दर्पण ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘दिग्विजय’, ‘पछाड़’, ‘जाल’, ‘लेकिन…’, ‘नेवरटुडाइ’, ‘जाने जिगर’, ‘जख्म’, ‘किस्सा सीताराम’, ‘मेरी जगह’ तथा ‘चिड़िया की उड़ान’।
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निशांत का कोहरा घना: आज़ादी की क्रांतिधारा का सृजनात्मक पाठ(रचनाकार: कमलाकांत त्रिपाठी)कमलाकांत त्रिपाठी भारतीय भाषाओं मे...
18/08/2022

निशांत का कोहरा घना: आज़ादी की क्रांतिधारा का सृजनात्मक पाठ
(रचनाकार: कमलाकांत त्रिपाठी)
कमलाकांत त्रिपाठी भारतीय भाषाओं में अपवाद-स्वरूप ऐसे उपन्यासकार हैं
जिन्होंने अपने उपन्यासों के केंद्र में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिधारा को
अधिष्ठित किया है। इस धारा के उन क्रांतिकारियों को नहीं, जिनके नाम इतिहास
के पृष्ठों पर अंकित हैं; जिनकी जयंतियाँ और पुण्यतिथियाँ मनाई जाती हैं—जिसके
वे हक़दार भी हैं। किंतु उनसे प्रेरणा लेकर, उन्हें आदर्श बनाकर, उनके क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े दर्ज़नों, बल्कि सैकड़ों ऐसे क्रांतिकारी देश के प्रत्येक प्रांत में सक्रिय थे, जिनके नाम इतिहास में कहीं दर्ज नहीं। वे केवल तत्कालीन
दस्तावेज़ों--अंग्रेजी सरकार के गज़ेटियर, आदेशपत्र, पुलिस थाने की रेकॉर्ड-बुक,
अदालती फ़ैसलों और समाचार पत्रों--में ही मिलेंगे। उनमें से जो गिरफ़्तार हो गए,
अधिकांश को फांसी पर लटका दिया गया, शेष भयावह यातनाओं की यंत्रणा से
गुज़रे। वे प्राय: कम पढ़े-लिखे किसान परिवारों से आये थे यद्यपि स्वयं अधिकांश
शिक्षित थे। उनमें सवर्ण थे, बहुजन थे और दलित भी थे। उन्होंने जो उत्कट
साहसिकता दिखाई, अंग्रेजों के लिए जो त्रासद स्थितियाँ उत्पन्न कीं, उनकी
जानकारी तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को ही रही होगी, थोड़ा-बहुत उनके घर-
परिवार, गाँव-जँवार के लोग जानते रहे होंगे। बाद के कालखंड में तो उन्हें बिल्कुल भुला ही दिया गया--इतिहास केवल नायकों का होता है, सामान्य कार्यकर्ताओं का लेखा-जोखा कौन रखता है! अतीत के ऐसे अनाम और विस्मृत क्रांतिकारियों के क्रियाकलापों का, उनके कठिन, अनिश्चित और ख़तरों से भरी ज़िंदगी के अंतरंग का सृजनात्मक पाठ रचते हैं त्रिपाठी जी के उपन्यास। इस तरह उपन्यास विधा का प्रयोग त्रिपाठी जी ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दायित्व निभाने के लिए किया है। इसके लिए वे अभिनंदन के पात्र हैं।
ये क्रांतिकारी भले ही साधारण परिवारों से आये थे, उनके कार्य मुख्य नायकों की
भाँति ही असाधारण थे, उनका बलिदान भी असाधारण था। इसलिए उनके जीवन
और क्रांतिकर्म का आख्यान हमारी राष्ट्रीय और जातीय स्मृति की महत्वपूर्ण
धरोहर है। इन उपेक्षित क्रांतिकारियों के जीवन और कर्म को अपने उपन्यासों का
उपजीव्य बनाने के लिए त्रिपाठी जी ने आधारभूत शोध किया है, जो उनके
असाधारण श्रम, संयम और धैर्य का प्रमाण है। तत्कालीन समाचारपत्र, गैज़ेट,
सरकारी दस्तावेज आदि की जानकारी प्राप्त कर इन्हें मुख्य क्रांतिकारी धारा से
जोड़ना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। कमलाकांत जी ने इसे पूरी निष्ठा से सम्पन्न
किया है। इसके लिए उनमें ज़रूरी वैचारिक प्रतिबद्धता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अधिकांश क्रांतिकारी संगठनों का वैचारिक आधार वाम विचारधारा थी। उनका क्रांतिकर्म ही इसलिए था कि वे देश को शोषक उपनिवेशवादी बेड़ियों से मुक्तकर आम आदमी का जीवन बेहतर बनाना चाहते थे। उसके अभाव को, उसके शोषण को, उसकी वंचना को दूर करना चाहते थे, उसके लिए सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के मूल्य साकार करना चाहते थे। कमलाकांत त्रिपाठी की प्रतिबद्धता इन्हीं मूल्यों के प्रति है। और इसी विचारधारा से प्रेरित और प्रतिबद्ध होकर वे उपन्यास-लेखन की ओर प्रवृत्त हुए हैं।
‘निशांत का कोहरा घना’ वस्तुत: त्रिपाठी जी के पूर्व-प्रकाशित उपन्यास ‘तरंग’ की
अगली कड़ी है। ‘तरंग’ जहाँ खत्म होता है, ‘निशांत का कोहरा घना’ वहीं से शुरू
होता है। तरंग के केंद्र में है हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के विच्छिन्न
क्रांतिकारियों की एक मंडली, जिसके मुखिया दादा हैं। दादा की मृत्यु के बाद मंडली का क्रांतिकर्म दिशाहीन होकर लड़खड़ाने लगता है। उसी दौरान मुम्बई में करो या मरो की घोषणा के साथ 1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन छिड़ जाता है। इसी बिंदु पर ‘तरंग’ का समापन और ‘निशांत का कोहरा घना’ का समारम्भ होता है। तरंग और निशांत का कोहरा घना के कई पात्र सामान्य हैं। इन पात्रों का व्यक्तित्व और कृतित्व निशांत का कोहरा घना में विस्तार पाता है और उनके माध्यम से सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की भावना जीवित रहती है। दादा उनके लिए निरंतर प्रेरणा-स्रोत बने रहते हैं।
एक महाराष्ट्रियन होने के नाते मैं त्रिपाठी जी के प्रति विशेष कृतज्ञता व्यक्त
करना चाहता हूँ कि उन्होंने इस कड़ी के पहले उपन्यास तरंग में बाबासाहेब
आंबेडकर के इतिहास में उपेक्षित कार्यों को प्रकाश में लाने की महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई और प्रस्तुत उपन्यास में सतारा में क्रांतिवीर नाना जी पाटील के अद्भुत
क्रांतिकर्म को हिंदी के व्यापक फलक पर लाने का ज़रूरी कार्य किया। बाबासाहब ने केवल दलितों के लिए नहीं, समस्त किसान और मज़दूर वर्ग की समस्याओं को लेकर संघर्ष किया था। उन्होंने बम्बई में कोंकण के खोती किसानों का विशाल मोर्चा आयोजित किया था जिसका समापन एस्प्लनेड मैदान में एक विशाल सभा में हुआ था। किसान-प्रतिनिधियों ने बाबासाहब के साथ बम्बई प्रेज़िडेंसी के ‘प्रधानमंत्री’ खेर से मिलकर खोती प्रथा की समाप्ति के लिए प्रतिवेदन दिया था।
उन्होंने बम्बई के मज़दूरों का भी एक शांतिपूर्ण मोर्चा निकाला था और कामगार
मैदान में उनकी विशाल रैली आयोजित की थी जिसमें क़रीब एक लाख़ मज़दूर
सम्मिलित हुए थे। डॉ. आम्बेडकर ने किसानों और मज़दूरों को शोषण-मुक्त करने
के लिए असेम्बली में बिल पेश किये और सतत उनकी लडाई लड़ी। इन प्रसंगों का बहुत संवेदनशील आख़्यान तरंग के कथावितान में संगुम्फित है। डॉ. आम्बेडकर के इस व्यापक व्यक्तित्व पर बहुत कम लिखा गया है। इस दृष्टि त्रिपाठी जी का यह योगदान अप्रतिम है।
ठीक इसी तरह प्रस्तुत उपन्यास में सतारा के नाना जी पाटील के क्रांतिकारी
व्यक्तित्व का, उनकी अद्भुत संगठन-क्षमता का, उनके द्वारा स्थापित प्रति-
सरकारों की कार्यपद्धति और उनकी सफलता के रहस्य का अंतरंग सामने आता
है। इसी बहाने लेखक समाजवादी नेता अच्युतराव पटवर्धन, क्रांतिकारी नौजवान
यशवंतराव चव्हाण, वसंतदादा पाटील तथा अरुणा आसफ़ अली के साहसिक कार्यों को पाठक के सामने लाता है। जाने-अनजाने वह उत्तर के क्रांतिकारियों को महाराष्ट्र के क्रांतिकर्म से जोड़ देता है। दोनों उपन्यास इसके प्रमाण हैं।
तरंग उपन्यास का अंत क्रांतिकारी कार्यो से जुड़े अंबिका के वरिष्ठ क्रांतिकारी
साथी महानरायन को लिखी एक चिट से होता है। तरंग में अंबिका और मेवा दादा
की मंडली के सदस्य हैं। वे क्रांतिकर्म के लिए मुम्बई भेजे गये थे। दादा की मृत्यु
के बाद मंडली की गतिविधियाँ शिथिल पड़ गईं। तभी मुम्बई के गवालिया टैंक
मैदान में 8 अगस्त 1942 का गांधी जी का प्रसिद्ध ‘भारत छोड़ो’ भाषण होता है,
जिसमें दोनों मौजूद रहते हैं। दोनों मुंबई से मंडली के इलाहाबाद ठिकाने पर पहुँचते हैं और महानारायन के साथ रुकते हैं। पता चलता है कि आर्मी के अधिकांश सदस्य क्रांतिकारी कार्यों से विदा ले चुके हैं। दोनों रात में एक चिट छोड़कर चुपके से वहां से निकल जाते हैं—‘महानरायन भाई साहब, माफ़ कीजिएगा। जानता हूँ, मैं कुछ भी कर लूँ, देश को आज़ादी की दिशा में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा सकता। हो सकता है हम फिर मिलें, हो सकता है, न मिलें। अब गुलाम देश में अपने को आपके सामने लाने का मेरा हौसला नहीं है।‘ और यही चिट निशांत का कोहरा घना के कथासूत्र का बीज-बिंदु है।
निशांत का कोहरा घना की शुरुआत अम्बिका और मेवा के युक्तप्रांत के अपने
ज़िले जौनपुर पहुँचकर वहाँ भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन चलाने की योजना से होती है। दोनों पहले अंबिका के गाँव जाते हैं। जल्द ही वे जौनपुर इलाक़े में पहले से सक्रिय एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ जाते हैं। संगठन के सदस्य के रूप में
पुलिस स्टेशनों पर धावा बोलकर वहाँ से शस्त्रास्त्र और गोली-बारूद लूटना, संगठन में नये-नये युवाओं को भरती करना, उन्हें प्रशिक्षण देकर सशस्त्र बनाना, डाकघर और सरकारी खजाना लूटकर संगठन के लिए संसाधन की व्यवस्था करना, इस तरह लगातार संगठन का विस्तार करना--इसी अजेंडे पर काम करते हुए अम्बिका संगठन का सूत्रधार बन जाता है और मेवा उसका प्रमुख सहायक। संगठन की महत्वाकांक्षी योजना देश भर में बिखरे हुए पुराने क्रांतिकारियों को जोड़कर एक विशाल, देशव्यापी नेटवर्क तैयार करने और युद्ध में फँसी ब्रिटिश सरकार को शिकस्त देकर देश को आज़ाद कराने की है। पहले उसकी मुठभेड़ पुलिस टुकड़ियों से होती है। बाद में प्रशासन द्वारा लगाई गई सेना की टुकड़ियों से झड़पें होने लगती हैं। वे छापामार युद्ध की रणनीति से लड़ते हुए, एक बड़े क्षेत्र पर हावी हो जाते हैं।
एक रात जब वे एक गन्ने के एक बड़े खेत में छिपकर विश्राम कर रहे थे,
मशीनगनों से लैस अँग्रेजी सेना की एक बड़ी टुकड़ी अचानक उन पर हमला कर
देती है। वे तीन ओर से घिर जाते हैं। ऐसे में उन्हें सोते से उठकर अँधेरी रात के
अंधकार में भागना पड़ता है। इस भगदड़ में अम्बिका अकेला पड़ जाता है। उसे
पता नहीं, मेवा का क्या हुआ। भागकर वह इलाहाबाद की बस पकड़ने में सफल हो जाता है। उसकी योजना इलाहाबाद होते हुए मुंम्बई पहुँचने की है। इलाहाबाद में मंडली का एक अन्य सदस्य, आइरिश पादरी, पार्ली उसके साथ हो लेता है। पार्ली को अपनी आइरिश मित्र, सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की पुरानी सदस्य सावित्री देवी (तरंग में वर्णित, यशपाल को आश्रय देने के जुर्म में सज़ा काटकर बाहर आई) से मुंबई में भूमिगत कार्रवाइयों में लगे कुछ नेताओं के नाम पत्र मिल जाते हैं। मुंम्बई पहुँचकर दोनों सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की पद्धति पर क्रांतिकर्म शुरू करना चाहते हैं। उसी सिलसिले में उनकी मुलाक़ात भूमिगत होकर कार्य कर रहे कांग्रेस के समाजवादी नेता अच्युत पटवर्धन से होती है। उनके नेटवर्क के सहयोग से मुंबई में अंबिका और पार्ली खोपोली के बिजलीघर को बम से उड़ाकर निष्क्रिय कर देते हैं, जिससे तीन दिन बिजली न आने और लोकल न चलने से मुंबई का अधिकांश कामकाज ठप रहता है। बिजलीघर को उड़ाने के बाद दोनों को तुरंत मुंबई छोड़कर बाहर निकल जाना था। ऐसे में वे पटवर्धन के माध्यम से सतारा में क्रांतिवीर नाना जी पाटिल के पास पहुँच जाते हैं और नाना जी के प्रति-सरकार संगठन से जुड़ जाते हैं। धीरे-धीरे नाना जी के सबसे अधिक विश्वासपात्र और उनके संगठन के अग्रणी क्रांतिकारी बन जाते हैं। सतारा के क्रांतिकारी अभियानों का नेतृत्व करने लगते हैं।
इस तरह इस उपन्यास के केंद्र में भी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के दो
क्रांतिकारियों का सतारा के क्रांतिसूर्य नाना जी पाटील की प्रति-सरकारों के इतिहास-प्रसिद्ध अनोखे अभियान है में भाग लेना है।
अम्बिका की कमज़ोरी मुंबई के एक बड़े सेठ की बेटी शशिकला है; जहां वह पहले(तरंग में वर्णित) मुनीम के रूप में काम करता था। अपने बम्बई-निवास के दौरान अम्बिका उससे मिलता है और पुराने सम्बंध में नई ऊष्मा का संचार होता है। इससे उपजे द्वंद् और बेचैनी की स्थिति से निजात पाने के लिए वह अपने
क्रांतिकर्म के दौरान मृत्यु की परवाह न कर, बड़ा से बड़ा जोखिम उठाने को तत्पर हो जाता है।
उपन्यास का एक बड़ा हिस्सा नाना जी पाटील की क्रांतिकारी प्रति-सरकार से
संबंधित है। हिंदी पाठकों के लिए यह एक नई और महत्वपूर्ण जानकारी है। नाना
जी पाटील की प्रति-सरकारों की अद्भुत कार्य-पद्धति का सूक्ष्म और विस्तृत
विवरण इस उपन्यास की बड़ी उपलब्धि है।
अम्बिका के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की एक टुकड़ी को गोवा से मुंबई आ चुके
अस्त्रों की बड़ी खेप ट्रक में लदे बालू के नीचे बोरों में छिपाकर वहाँ से सतारा ले
जाने का दायित्व सौंपा जाता है। मुंबई में पुलिस को अम्बिका की भनक लग जाती
है। वह ट्रक का पीछा करती है। पुलिस बैरियर पर ट्रक को रुकने के लिए मजबूर
होने पर अंबिका उससे कूदकर आत्मसमर्पण कर देता है। पुलिस को ट्रक में बालू
के नीचे हथियारों के बोरे होने की ख़बर नहीं है। इस कारण अम्बिका आत्मसमर्पण कर साथी क्रांतिकारियों तथा अस्त्रों की खेप को सुरक्षित सतारा पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करने में सफल होता है। अम्बिका पर मुक़दमा चलता है तथा जौनपुर में एक ख़ुफ़िया पुलिसकर्मी की हत्या के जुर्म में, उसे फ़ाँसी की सजा सुना दी जाती है। शशिकला के प्रयास से प्रीवी कौंसिल में अपील दायर होती है किंतु भारत के अनिश्चित राजनीतिक माहौल के मद्देनज़र वहाँ लंबित पड़ी रहती है। 2 सितम्बर 1946 को केंद्र में कांग्रेस की अंतरिम सरकार बनने पर फांसी का इंतज़ार करते अंबिका को क्षमादान मिल जाता है और वह जेल से मुक्त हो जाता है। इसी के साथ उपन्यास का भी समापन हो जाता है। उस बिंदु से 15 अगस्त 1947 को विभाजन के साथ आज़ादी मिलने तक का राजनीतिक ब्योरा उपन्यास के परिशिष्ट में दर्ज है।
1942 से 1946 के 4 वर्षों के घटना-सूत्र को उपन्यास की कथावस्तु में अपूर्व
सृजनात्मक कुशलता और ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि के साथ पिरोया गया है।
अम्बिका का निजी, पारिवारिक जीवन तथा उसके रागात्मक सम्बंधों का द्वंद्व
एक नाटकीय विडम्बना को जन्म देता है जिसका बहुत सजगता और रचनात्मकता के साथ कथावस्तु के संयोजन में इस्तेमाल हुआ है। एक ओर अम्बिका की ग्रामीण पत्नी कलावती और दूसरी ओर मुंबई के सेठ चूड़ीवाला की एकमात्र संतान, युवा किंतु परित्यक्ता पुत्रीउसे शशिकला का उसके प्रति तीव्र आकर्षण! इससे सम्बंधों का जो एक जटिल किंतु नाज़ुक त्रिकोण बनता है, लेखक ने बेहद संवेदनशीलता से उसका चित्रण किया है। सेठ की असामयिक मृत्यु के बाद धंधे की पेचीदगियों से अनजान शशिकला अम्बिका का सहारा खोजती है जिसने एक ईमानदार और कुशल मुनीम के रूप में सेठ की बीमारी के समय ही धंधा सँभाल लिया था।
क्रांतिकर्म में अम्बिका की प्रतिबद्ध, साहसिक भूमिका, पत्नी के प्रति उसका
दायित्वबोध और शशिकला के संकटमोचक की भूमिका में जो विकट अंतर्द्वंद्व है,
उसके निर्वाह में लेखक ने बेहद परिपक्व मानवीय दृष्टि का परिचय दिया है।
उपन्यास के नेपथ्य में स्त्री-पुरुष आकर्षण और चुम्बकीय दैहिकता का ऐसा
अनगढ़ राग बजता है जिसका समाहार उपन्यास के अंत में, अम्बिका के फाँसी से
बच निकलने पर कलावती और शशिकला की सौहार्दपूर्ण मुलाक़ात में ही संभव था, जैसा कि उपन्यास में होता है।
तरंग में कोई एक व्यक्ति केंद्र में नहीं था। वहां क्रांतिकर्म ही केंद्र में था। कांग्रेस
दल से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों के समानांतर। दोंनों में वैचारिकत द्वंद्व
सतत चलता रहा जो पात्रों की राजनीतिक चर्चाओं में क्रांतिधारा की रोशनी में
व्यक्त होता था। उसकी तुलना में निशांत का कोहरा घना में राजनीतिक चर्चाएँ
कम, क्रांतिकारियों की साहसपूर्ण घटनाएं अधिक हैं।
अध्याय 1 से 18 तक अंबिका अपने घर लौटकर वहाँ चल रही छापामार मुठभेड़ों
में उलझा रहता है। तीन थानों पर आक्रमण कर वहां के अस्त्रों का अधिग्रहण और
नवयुवकों की भर्ती से संगठन को सशक्त करता है। अपने क्रांतिकारी साथी की
प्राणरक्षा के लिए एक पुलिसकर्मी की जान लेने से भी नहीं हिचकता। अचानक हुए सैनिक हमले से भागकर मुंबई आता है तो भूमिगत क्रांतिकारी सदस्यों से मिलकर पुन: क्रांतिकर्म में सक्रिय हो जाता है। मुंबई उसकी दुखती रग है क्योंकि वहां शशिकला है। इस शशिकला के व्यक्तित्व का जो दर्शन तरंग में होता है, उसकी तुलना में इस उपन्यास में वह अधिक परिपक्व, अधिक समझदार ,अधिक गंभीर लगती है। उसे अब तक पता नहीं था कि अंबिका एक क्रांतिकारी है। जब अंबिका अपने साथियों को बचाने के लिए आत्मसमर्पण कर देता है, उसके मुक़दमे की पैरवी में सर्वाधिक सक्रिय शशिकला है। वह पूरी निर्भीकता से अपना दायित्व निभाती है। अंग्रेजों के शासन में एक भारतीय पूँजीपति की बेटी क्रांतिकारी की सहायता के लिए दौड़धूप कर रही है और उसका आर्थिक भार वहन कर रही है, इस प्रसंग में शशिकला की साहसिकता का, उन दिनों के लिहाज़ से, एक अतिरिक्त आयाम जुड़ जाता है। शशिकला और अंबिका के सम्बंधों का आख्यान लेखक ने बेहद गंभिरता से रचा है। यहाँ रोमानियत के लिए काफ़ी अवकाश था किंतु लेखक की सोद्देश्यता ने उसे उसके प्रवाह में बहने से बचा लिया है।
उपन्यास के आरंभ से अंत तक की घटनाएं पूर्ण रूप से यथार्थ हैं। इसमें आए
अधिकांश पात्र भी यथार्थ हैं। इसमें जो मराठीभाषी पात्र हैं उनके कार्यों से प्रत्येक
मराठीभाषी परिचित है। नाना जी पाटील, अच्युतराव पटवर्धन, यशवंतराव चव्हाण,
वसंतदादा पाटील राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। अंबिका, मेवा,
पार्ली, शशिकला, रामदीन छोटे-बड़े पात्र हैं जिनमें अम्बिका भी एक ऐतिहासिक पात्र है। घटनाएं यथार्थ, अधिकांश पात्र यथार्थ। यथार्थ घटनाओं और यथार्थ पात्रों को जोड़ने का काम काल्पनिक पात्र करते हैं।
कमलाकांत जी की एक विशेषता परिवेश के कुशल चित्रण में है। जहां घटनाएं
घटित होती है वहां की प्रकृति और भौगोलिक स्थिति का इतने विस्तार और इतनी
सूक्ष्मता से चित्रण करते हैं कि पाठक के सामने वहाँ का घटित अपने परिवेश के
साथ चाक्षुष हो उठता है। उस परिवेश में वर्षों से जीने वाला भी उसे पढ़ कर
आश्चर्यचकित रह जाता है। उत्तर प्रदेश के गाँवों के चित्र तो उत्तम हैं ही, लेखक
वहीं के निवासी हैं। किंतु सतारा, गोवा, मुंबई के आसपास के गांवों, नदियों, नालों
वनस्पतियों, फ़सलों का जो अविकल चित्र उन्होंने खींचा है उसे पढ़कर मराठी
पाठक अतिरिक्त रूप से रससिक्त होता है।
त्रिपाठी जी के उपन्यासों में स्थानीय शब्दों का प्रयोग इस तरह हुआ है कि
सम्बंधित पात्र जीवंत हो उठें। मराठी के ये शब्द सर्वथा उचित स्थानों पर आते हैं,
इसलिए हिंदीभाषी पाठक को खटकते नहीं। मराठियों के खानपान की वस्तुओं,
उनकी वेशभूषा, उनकी संस्कृति का इतना बारीक चित्रण हुआ है और वह इतने
सहज रूप में आया है कि सुखद आश्चर्य होता है।
आज के राजनीतिक परिवेश में इस उपन्यास का विशेष महत्व है। आज हमें जिस
राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया जा रहा है उसमें तात्विकता कम और
नारेबाज़ी अधिक है। देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारियों ने किस तरह की
नि:स्वार्थ और साहसिक भूमिका निभाई, कैसा बलिदान दिया, कितनी यातनाएँ
सहीं, कितने कष्ट झेले, नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने के लिए कमलाकांत जी
बधाई के पात्र हैं। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की सच्चाइयों को समझने के लिए
हिंदीभाषियों को, ख़ासकर नई पीढ़ी को, त्रिपाठी जी के उपन्यास अवश्य पढना
चाहिए।
क्रांतिवीर नाना जी पाटील के क्रांतिकर्म पर मराठी में काफ़ी लिखा गया है। परंतु
उनके कार्यों, उनकी अनोखी कार्य-पद्धति और उनके अप्रतिम योगदान को भारतीय स्तर पर ले जाने का जो प्रयत्न लेखक ने किया है, उसका महत्व
अनन्य है।
इस उपन्यास के मराठी अनुवाद की सख़्त ज़रूरत है।
--सूर्यनारायण रणसुभे
#पढ़िएकिताब
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Kamlakant Tripathi

"दस प्रतिनिधि कहानियां : फणीश्वरनाथ रेणु " (पेपरबैक) पृष्ठ- 152  /  मूल्य- 135.00 रुपये \इस पुस्तक को क्रय करने हेतु इस ...
02/07/2022

"दस प्रतिनिधि कहानियां : फणीश्वरनाथ रेणु " (पेपरबैक)
पृष्ठ- 152 / मूल्य- 135.00 रुपये

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"त्रिया-हठ" (पेपरबैक) (उपन्यास)पृष्ठ-166 / मूल्य-144.00 रुपये
24/06/2022

"त्रिया-हठ" (पेपरबैक) (उपन्यास)
पृष्ठ-166 / मूल्य-144.00 रुपये

 #पढ़िएकिताब "मेरे साक्षात्कार : गोविन्द मिश्र"          अनेक उल्लेखनीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ लेखक गोविन्द मिश्र का ...
23/06/2022

#पढ़िएकिताब "मेरे साक्षात्कार : गोविन्द मिश्र"



अनेक उल्लेखनीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ लेखक गोविन्द मिश्र का रचना-संसार व्यापक और बहुआयामी है। उनका कथा-साहित्य मानवीय मूल्यों को विश्लेषित करते हुए परंपरा और प्रगति को एक नया अर्थ देता है। सामान्य जीवन, व्यवस्था, राजनीति और सामाजिक द्वंद्व को उसकी मूल चेतना के साथ समझते हुए उन्होंने अद्भुत कहानियों व उपन्यासों की रचना की। ऐसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार की रचनाओं का मर्म कई बार उनके साक्षात्कारों में भी खुलता है। इस दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक बेहद ज़रूरी और पठनीय है। कई बार हम ‘क्रिएटिव’ लेखक से विभिन्न विषयों पर उसके विचार जानना चाहते हैं, विषय साहित्य भी हो सकता है साहित्येतर भी। जानने के क्रम में किया गया संवाद साक्षात्कार नामक विधा को समृद्ध करने के साथ रचनाकार के व्यक्तित्व-कृतित्व को भी नए सिरे से प्रकाशित करता है। इस पुस्तक में उपस्थित साक्षात्कारों को पढ़ते हुए पाठक पाएंगे कि गोविन्द मिश्र का चिंतक-विचारक रूप पर्याप्त ध्यानाकर्षक है।
एक प्रश्न के उत्तर में गोविन्द मिश्र कहते हैं, ‘एक और छोटी सी बात जोड़ दूं कि मेरा अधिकतर लेखन आत्मपरक है। पहले मैं यह कहने में संकोच करता था, पर जब मैंने एक जगह पढ़ा कि टाॅलस्टाॅय का लेखन भी अधिकतर आत्मपरक था तो मुझमें इस स्वीकारोक्ति के लिए साहस आया। सच यह है कि जो लेखन जितना आपके जीवन, आपकी गहन अनुभूतियों से उठेगा वह उतना ही प्रभावी होगा।’ तात्पर्य यह कि पूर्वनिर्मित धारणाओं का अनुगमन उन्होंने कभी नहीं किया, भले ही ‘प्रमाणपत्रा’ बांटने वाले उनकी रचनाओं को लेकर कई बार संशय में दिखे। गोविन्द मिश्र इस महादेश के जन-मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं।
ये साक्षात्कार रचनाकार के मनोविज्ञान को समझाते हुए साहित्य व समाज के बहुतेरे प्रश्नों से गुजरते हैं। यही कारण है कि ये व्यक्ति केंद्रित होने से बच गए हैं। इनको पढ़ना यानी एक बड़े रचनाकार को समझने के साथ परंपरा, वर्तमान और सभ्यता के भविष्य का सामना करना है।

17/03/2022
 #पढ़िएकिताब "कवि ने कहा : इब्बार रब्बी" (पेपरबैक)"हां जी, हो गए चुनावचुन लिए हमने अपने जल्लादचुन लीं हमने नये करों की सू...
04/03/2022

#पढ़िएकिताब "कवि ने कहा : इब्बार रब्बी" (पेपरबैक)

"हां जी, हो गए चुनाव
चुन लिए हमने अपने जल्लाद
चुन लीं हमने नये करों की सूचियां
चुन लिए हमने फिर वही भाषण
फिर कर लिया हमने वायदों पर एतबार
फिर हमने पसंद किया एक छुरा
फिर हमने देखा अड्डा।

ढीले या कसे
गोल या चौकोर
पूरी आजादी से चुन लिए
अपने फंदे
बिना किसी दबाव के
बिना जोर-जुल्म के
तय कर लिए अंधे कुएं।"

 #पढ़िएकिताब "कवि ने कहा : मदन कश्यप" (पेपरबैक)"गीली लकड़ियों को फूँक मारतीआँसू और पसीने से लथपथचूल्हे के पास बैठी है औरतह...
14/02/2022

#पढ़िएकिताब "कवि ने कहा : मदन कश्यप" (पेपरबैक)

"गीली लकड़ियों को फूँक मारती
आँसू और पसीने से लथपथ
चूल्हे के पास बैठी है औरत

हजारों-हजारों बरसों से
धुएँ में डूबी हुई
चूल्हे के पास बैठी है औरत

जब पहली बार जली थी आग धरती पर
तभी से राख की परतों में दबाकर
आग जिंदा रखे हुई है औरत !"

https://www.bookshindi.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac/%e0%a4%b8...
10/01/2022

https://www.bookshindi.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be/

कमलाकांत त्रिपाठी के उपन्यास ‘सरयू से गंगा’ का अंश ...प्लासी की परिणति में कंपनी के पिट्ठू मीर जाफर को बंगाल की गद्द...

देश के शीश गुरु तेग बहादुर : दैनिक जागरण में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा
18/12/2021

देश के शीश गुरु तेग बहादुर : दैनिक जागरण में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा

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#संगिनी_आपकी_हमसफ़र मासिक का खूबसूरत दिसम्बर 2021 अंक प्रकाशित ..
#संपादक :माधुरी घोष। ंपादक : राजकुमार जैन राजन

●उच्चस्तरीय सामग्री, बेहतरीन छपाई, हर अंक में कम से कम 68 पृष्ठ हर माह
●प्रिय पाठक ! रचनाकार !
"संगिनी" की प्रकाशन यात्रा के नौ वर्ष पूरे हो चुके हैं... दसवें वर्ष में प्रवेश किया है।अल्प समय में "संगिनी" ने जो विश्व्यापी पहचान अर्जित की है यह आप सभी के सहयोग और साथ के बिना संभव नहीं था। इस सम्बन्ध की निरंतरता बनी रहेगी... ऐसी आशा है।
मोबाइल और ऑनलाइन रीडिंग के इस युग में ई-पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गयी है.. प्रिंट पत्रिका निकालना बेहद मुश्किल काम है इसलिए प्रिंट पत्रिकाओं की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है। ऐसी स्थिति में पत्रिका की निरंतरता को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि पत्रिका के ज्यादा से ज्यादा सदस्य हों ताकि पत्रिका के नियमित प्रकाशन को मजबूती मिले। हिन्दीतर भाषी प्रदेश गुजरात से प्रकाशित इस हिंदी पत्रिका "संगिनी" की द्विवार्षिक, पंच वर्षीय, आजीवन, संरक्षक सद्स्यता ग्रहण कर इसके नियमित पाठक बनने का विनिम्र निवेदन है।
● रचनाएँ स्तरीयता के आधार पर ही प्रकशित की जाती है, इसके लिए सदस्य होने की कोई अनिवार्यता नहीं है । बस, निवेदन होता है कि यदि आप सदस्य बन सकते हैं तो अवश्य सहयोग करें, आपका सद्स्यता शुल्क पत्रिका के लिए प्राणवायु का काम करेगा।*
वार्षिक शुल्क - ₹.800/-
द्विवार्षिक शुल्क - ₹.1600/-रुपये मात्र है ( सद्स्यता केवल रजिस्टर्ड डाक द्वारा पत्रिका हेतु है)
अधिक जानकारी के लिए व्हाट्सएप्प न. 9828219919 पर संपर्क किया जा सकता है
●भुगतान करने के बाद स्क्रीनशॉट या भुगतान की डिटेल व्हाटसप पर भेजें..
नोट: भुगतान के बाद आपका पूरा पता, पिन कोड, संपर्क नम्बर जरूर भेजें..पत्रिका रजिस्टर्ड पोस्ट से आप तक पहुंचती रहेगी।
◆ "संगिनी" के आगामी अंकों हेतु गुणवत्ता युक्त साहित्यिक, पारिवारिक रचनाएँ लेखक के परिचय, ताज़ा फोटो सहित सादर आमंत्रित है। पत्रिका का उद्देश्य हिंदी का प्रचार प्रसार करना, नए लेखकों को प्रोत्साहन देना व उत्कृष्ट साहित्य पाठकों तक पहुंचाना है। पत्रिका का प्रसार सम्पूर्ण भारतवर्ष सहित नेपाल, मॉरीशस, थाईलैंड,दुबई, म्यांमार, मलेशिया,कनाडा, इंग्लैंड, अमरीका के हिंदी पाठकों तक है।

आप अपनी रचनाएँ ईमेल - [email protected] पर या व्हाटसप न .9828219919 किसी एक माध्यम पर ही भेजें
सद्स्यता शुल्क निम्न में से किसी बैंक खाते में अपना शुल्क #नेफ्ट #द्वारा जमा करवा कर सूचित करें-
I D B I Bank, चित्तोड़गढ़ शाखा
राजकुमार जैन राजन
बचत खाता न. 111104000009911
Ifsc code - IBKL0000111
●●अथवा

ICICI Bank, चित्तौरगढ़ शाखा
राजकुमार जैन
बचत खाता स. 666901095523
Ifsc code-ICIC0006669
●●अथवा

गूगल पे/पे टी एम - 9828219919

*इस जानकारी को अपने साहित्यिक ग्रुप में प्रेषित कर भी सहयोग दे सकते हैं*
●●● कॉमेंट बॉक्स में कोई भी व्यक्तिगत मेसेज न करें ●●●
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समकालीन साहित्य समाचार पुणें महाराष्ट्र में मिल सकता है क्या ? चंदा देना पडेगा? मेरा email adress
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05/09/2021
● वर्ष 2021 का बाल साहित्य: समीक्षा श्रृंखला-22

इस श्रृंखला के तहत आज प्रस्तुत है वरिष्ट रचनाकार #श्री_गोविंद_शर्मा , संगरिया, के बाल कहानी संग्रह #गागर_में_सागर की समीक्षा/परिचय। इस श्रृंखला को पटना से प्रकाशित दैनिक "दस्तक प्रभात", "लोकोत्तर" सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित किया जा रहा है। हार्दिक आभार-

■ #बालसाहित्य_के_शुभचिंतकों #रचनाकारों_से_निवेदन_है_कि_हमारे_इस_प्रयास_पर_अपनी_बेबाक_टिप्पणी_देकर_अनुग्रहित_करावें। आभारी रहेंगे।

● वर्ष 2021 में प्रकाशित बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की ये समिक्षाएँ एक संग्रह के रूप में प्रकाशित होगी और #वर्ष_2021_का_बाल_साहित्य_एवं_उम्मीद आलेख में भी परिचय प्रकाशित होगा। तथा वर्ष की दो श्रेष्ठ बालसाहित्य कृतियों को 'डॉ. राष्ट्रबन्धु बालसाहित्य सम्मान' एवं 'डॉ. श्रीप्रसाद बालसाहित्य सम्मान' से #सम्मानित भी किया जाएगा।अतः ज्यों-ज्यों रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हो, हमें दो प्रति रजिस्टर्ड डाक से इस पते पर भिजवाते रहिएगा-
◆ राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन, आकोला -312205, (चित्तौड़गढ़) राजस्थान, मोबाइल : 9828219919
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वर्ष 2021 का बाल साहित्य -22
शिशुओं के लिए उद्देश्य पूर्ण करती : 'सागर में गागर'
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समीक्ष्य कृति : 'सागर में गागर' (शिशुओं की कहानी)
लेखक : श्री गोविंद शर्मा , संगरिया
प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत,5- इंस्टिट्यूशनल एरिया, फेज-।।, नेहरू भवन, वसंत कुंज, नई दिल्ली -110070
द्वितीय संकरण : 2021, मूल्य : 35 रुपये मात्र
समीक्षक : राजकुमार जैन राजन, आकोला (राज.)
मोबाइल न. 9828219919
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बाल साहित्य ही है जो पाठ्य पुस्तकों से इतर बच्चों को खेल-खेल में बहुत सारी अवधारणाओं, परम्पराओं, संस्कारों के प्रति समझ बढ़ाने में सहायक होता है। बाल साहित्य ही वह सहायक सामग्री है जिसकी सहायता से बच्चे की मौखिक भाषा-शैली संवर सकती है। बच्चों में संवाद अदायगी का विस्तार हो सकता है और शब्द ज्ञान बढ़ता है ... बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे कल्पना लोक में विचरण करते है इससे उनमें सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है ।
बच्चों के भविष्य निर्माण में पुस्तकों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। कहानी सुनने, पढ़ने से उनके भीतर जिज्ञासा जागृत होती है। कहानी बाल साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। बच्चे सहज ही कहानी से तादात्म्य स्थापित कर लेते है। बच्चों के लिए लगभग 38 पुस्तकें लिख चुके, राजस्थान साहित्य अकादमी, केंद्रीय साहित्य अकादमी, प्रकाशन विभाग द्वारा सर्वोच्च बाल साहित्य सम्मान से सम्मानित राजस्थान के संगरिया निवासी वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री गोविंद शर्मा की शिशु वय के बालकों के लिए एक सुंदर चित्रों से सजी रोचक कहानी की पुस्तक "सागर में गागर " को 'नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने प्रकाशित किया है, जिसका द्वितीय संस्करण हाल ही में प्रकाशित हुआ है। कहानी को सुंदर सजीव-से चित्रों से सजाया है-चित्रकार अबिरा बंदोपाध्याय ने।
इस पुस्तक में एक गागर (मटके) की खूबसूरत कहानी है जो धरती से सागर तक कि यात्रा करता हुआ फिर कैसे धरती पर पहुंचता है? अपनी इस यात्रा में गागर नाले से नदी और नदी से समुद्र में पहुंच जाता है। रास्ते की रोचक घटनाओं का वर्णन इस पुस्तक को बार बार पढ़ने को प्रेरित करता है। गागर के साथ मछलियों, चिड़िया और दो दोस्तों का बहुत मनभावन घटनाक्रम लेखक ने निर्मित किया है। गागर छोटी मछलियों को कैसे सुरक्षा प्रदान करती है। आगे की यात्रा में सागर में भटक गई चिड़िया उस गागर पर संरक्षण लेती है। वहीं चिड़िया ने बनाये अपने आशियाने में अंडे दे दिए। एक दिन तूफान आया तो गागर संग चिड़िया व उसके बच्चे भी किनारे पहुंच गए। कुछ बच्चों ने दया भाव दिखा घोंसले को किनारे के पेड़ पर रख दिया और गागर को अपने घर ले गए। घर से सागर होती हुई फिर घर पहुंचने की घटना के द्वारा नन्हे बच्चों के मन में कई प्रकार की सीख-संस्कारों का बीजारोपण भी कर दिया।
इस कहानी के कुछ वाक्य देखिए- 'उसे छोटी नदी कहो या नाला' ... 'अब उसे यहां घर जैसा कोई प्राणी नहीं दिखाई दिया' ... 'जिधर भी हवा के झोंके ले जाते, उधर ही चली जाती' ... ' दोनों छोटी मछलियों की जान बच गई' ... ' लगा, चिड़िया उड़ते उड़ते थक गई है, वह कहीं बैठना चाहती है' ... 'पर छोटी मछलियां नाराज़ नहीं हुई... छोटी मछलियों ने खुशी-खुशी गागर का मैदान चिड़िया के लिए छोड़ दिया' ...' रुपये पैसों के खजाने से भी कीमती है यह खजाना'... 'दोनों ने चिड़िया के बच्चों को बचाने की सोच ली' ... ' बच्चे गागर को भी अपने साथ घर ले आये' ... और कहानी का सार बताते अंतिम वाक्य - ' गागर इस लिए भी खुश थी कि पहले उसने छोटी मछलियों को बचाया, फिर चिड़िया और उसके अंडे को बचाया। अब फिर से घर के लोंगों को साफ पानी पिला रही है। सबका भला करने वाला खुश तो रहता ही है।''
बाल मन और बाल मनोविज्ञान के गहन पारखी श्री गोविंद शर्मा जी ने इस कहानी को घटना प्रधान शिल्प में इस तरह रचा है कि बालकों को गागर, नदी, नाला, समुद्र, मछली, हवा, चिड़िया, बच्चे, धरती, पेड़ के बारे में जानकारी देते हुए दयालुता, मित्रता, मदद करने आदि के संस्कार भी देने का सफल प्रयास किया है। बहुत ही सरल, सरस व हृदय ग्राही भाषा में लिखी यह कहानी रोचक व मनोरंजक है। शिशुओं सहित हर वय के बाल पाठकों को पसंद आने वाली कहानी है।सुंदर चित्रांकन के कारण कहानी मुंह बोलती-सी लगती है।जो बच्चों को सहज ही याद हो जाएगी। कहानी में अन्तर्निहित तत्व, रोचकता, सहजता, कौतुहल, प्रेरणा तथा रसात्मकता बच्चे की मानसिक क्षुधा को शांत करती है। बालमन की कोमलता, निश्छलता, सोच और कल्पनाओं तक अपनी पहुँच बनाने में कहानीकार सफल रहे हैं।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत सरकार का उपक्रम हैं। बच्चों के लिए कई पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। श्री गोविंद शर्मा जी व पुस्तक न्यास को इस उत्कृष्ट कृति के लिए हार्दिक बधाई एवं मंगलकामना।
◆ राजकुमार जैन राजन
चित्रा प्रकाशन
आकोला -312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान
मोबाइल : 9828219919
ईमेल - [email protected]
29/08/2021
● वर्ष 2021 का बाल साहित्य: समीक्षा श्रृंखला-21

इस श्रृंखला के तहत आज प्रस्तुत है वरिष्ट रचनाकार #डॉ_फकीर_चंद_शुक्ला , , के बाल कहानी संग्रह #हो_गया_उजाला की समीक्षा/परिचय। इस श्रृंखला को पटना से प्रकाशित दैनिक "दस्तक प्रभात" सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित किया जा रहा है। हार्दिक आभार-

■ #बालसाहित्य_के_शुभचिंतकों #रचनाकारों_से_निवेदन_है_कि_हमारे_इस_प्रयास_पर_अपनी_बेबाक_टिप्पणी_देकर_अनुग्रहित_करावें। आभारी रहेंगे।

● वर्ष 2021 में प्रकाशित बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की ये समिक्षाएँ एक संग्रह के रूप में प्रकाशित होगी और #वर्ष_2021_का_बाल_साहित्य_एवं_उम्मीद आलेख में भी परिचय प्रकाशित होगा। तथा वर्ष की दो श्रेष्ठ बालसाहित्य कृतियों को 'डॉ. राष्ट्रबन्धु बालसाहित्य सम्मान' एवं 'डॉ. श्रीप्रसाद बालसाहित्य सम्मान' से #सम्मानित भी किया जाएगा।अतः ज्यों-ज्यों रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हो, हमें दो प्रति रजिस्टर्ड डाक से इस पते पर भिजवाते रहिएगा-
◆ राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन, आकोला -312205, (चित्तौड़गढ़) राजस्थान, मोबाइल : 9828219919
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वर्ष 2021 का बाल साहित्य -21

उम्मीद की किरण जगाती है बाल कहानियाँ : 'हो गया उजाला'
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पुस्तक का नाम - हो गया उजाला (किशोरोपयोगी बाल कहानियाँ)
लेखक - डॉ. फकीरचंद शुक्ला
प्रकाशक - वनिका पब्लिकेशन, एन. ए. 168, वनिका पब्लिकेशन, विष्णु गार्डन, नई दिल्ली- 110018
प्रकाशन वर्ष - 2021, मूल्य: रु. 100/-

समीक्षक : डॉ. अलका जैन 'आराधना', जयपुर
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आजकल बच्चों के लिए बहुत कुछ लिखा जा रहा है। किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए भी इन दिनों बहुत-सी पुस्तकेंआ रही हैं। महामारी के इस दौर में बच्चे हैरान-परेशान हैं... खेलना कूदना कम हो गया है और ऑनलाइन पढ़ाई बच्चों को ज्यादा रास नहीं आ रही। ऐसे में बच्चों को संस्कारित करने के लिए अच्छा साहित्य पढ़ने की प्रेरणा देना जरूरी है। किशोरावस्था तक आते-आते बच्चों में एक सामान्य समझ विकसित हो जाती है और इस समझ को परिपक्व बनाने में किशोरों के लिए लिखी गई कहानियाँ बहुत उपयोगी हो सकती हैं। इंटरनेट के इस युग में आजकल बच्चों से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। प्रश्न सिर्फ चुनाव का है कि बच्चों को अपने लिए क्या चुनना है ? हमारे किशोरों को आज मार्गदर्शन की बहुत आवश्यकता है पर यह मार्गदर्शन दोस्ताना होना चाहिए... उपदेश एक सीमा तक ही कारगर हो पाते हैं। माता पिता से किए गए आत्मीय संवाद से किशोर संबल पाते हैं, परिवार से जीवन में रौनक बनी रहती है... दोस्त जीने की उमंग जगाते हैं और अच्छी किताबें किशोरों को जीने की राह दिखाती हैं।
ऐसी ही एक किशोर उपयोगी पुस्तक है सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ.फकीरचंद शुक्ला की 'हो गया उजाला ' इस किताब का शीर्षक आकर्षित करता है और प्रेरित भी। इसका मुखपृष्ठ उगते सूरज की आभा को प्रकृति की अदभुत चित्रकारी के साथ प्रस्तुत करता है । डॉ. शुक्ला पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हैं और फूड टेक्नोलॉजी में पीएचडी हैं। इस किशोर उपयोगी कहानी संग्रह में अपने आहार-विज्ञान संबंधी ज्ञान को कहानियों का आकार देने में लेखक ने सफलता पाई है ।

आज के किशोरों के जीवन के दो प्रमुख स्तंभ है -आहार और विचार। इस पुस्तक में इन दोनों को केंद्र बनाकर एक से बढ़कर एक कहानियाँ रची गई हैं। इन कहानियों में विविधता तो है ही... साथ ही पाठकों को बांधे रखने की क्षमता भी है। इस पुस्तक में कुल 6 कहानियां हैं। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें उपदेशात्मक भाव कहीं भी नहीं है। इन कहानियों में बच्चे अपने अनुभवों से सीखते हैं और अपनी गलतियों से सबक भी लेते हैं। कहानियों में अपनी गति है और लय भी... इसीलिए ये कहानियाँ कहीं भी बोझिल नहीं होती और सरस बनी रहती हैं।

पहली कहानी 'दृढ़ निश्चय' में बच्चों में फास्ट फूड के प्रति बढ़ते आकर्षण को केंद्र में रखते हुए बहुत ही प्रभावशाली ढंग से इसके दुष्प्रभाव पर प्रकाश डाला गया है। दूसरी कहानी 'हिम्मत ' में आज बच्चों में ट्यूशन की बढ़ती प्रवृत्ति के नुकसानों को बहुत ही विश्वसनीय ढंग से बताया गया है।दरअसल ट्यूशन की प्रवृत्ति एक दीमक की तरह है जो बच्चों के दिलों-दिमाग को खोखला कर देती है।

पुस्तक की तीसरी कहानी 'सही राह' बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण और अस्वास्थ्यकर खान-पान के कारण आ रहे हैं मोटापे को लेकर लिखी गई है। इसमें यही बताया गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है ।
बच्चों के लिए व्यायाम और खेलकूद की आवश्यकता को निरूपित करती यह कहानी बहुत सुंदर बन पड़ी है । 'उजाला' कहानी बच्चों में मोबाइल की और मोबाइल गेम्स की बढ़ती लत पर करारी चोट करती है। मोबाइल में गेम खेलने से दिलो-दिमाग और शरीर पर होने वाले कुप्रभावों को इस अंदाज में प्रस्तुत किया गया है कि बच्चों को स्मार्टफोन दिए जाने की उपादेयता के बारे में पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है। यदि उन्हें मोबाइल दिया भी जाए तो यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है कि बच्चे उसका उपयोग कैसे करते हैं? 'जन्मदिन' कहानी आज के बच्चों में नैतिक मूल्यों के बीजारोपण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी है ।
आजकल जन्मदिन पर दोस्तों को बड़े होटल में पार्टी देने का चलन है। इस कहानी में समीर होटल में पैसे बर्बाद करने के बजाय अपना जन्मदिन मनाने के लिए मिलने वाले रुपयों को उपेक्षित बच्चों के भले के लिए खर्च करता है। 'धन्यवाद अराध्य' कहानी भी नैतिक मूल्यों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह जीव दया का भाव मन में जगाती है और बच्चों को यह भी सिखाती है कि सभी का जीवन अनमोल है।

पुस्तक की भाषा अत्यंत प्रभावी है और छपाई भी आकर्षक है। लेखक अपने परिवेश के प्रभाव से अछूते नहीं रह पाए हैं और भाषा पर यह प्रभाव उनकी कहानियों के सौंदर्य में चार चांद लगाता है। किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए एक सार्थक पुस्तक के सृजन हेतु डॉक्टर फकीर चंद शुक्ला को हार्दिक बधाई।
●डॉ. अलका जैन 'आराधना'
जयपुर ।