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#संगिनी_आपकी_हमसफ़र मासिक का खूबसूरत दिसम्बर 2021 अंक प्रकाशित ..
#संपादक :माधुरी घोष। ंपादक : राजकुमार जैन राजन
●उच्चस्तरीय सामग्री, बेहतरीन छपाई, हर अंक में कम से कम 68 पृष्ठ हर माह
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05/09/2021
● वर्ष 2021 का बाल साहित्य: समीक्षा श्रृंखला-22
इस श्रृंखला के तहत आज प्रस्तुत है वरिष्ट रचनाकार #श्री_गोविंद_शर्मा , संगरिया, के बाल कहानी संग्रह #गागर_में_सागर की समीक्षा/परिचय। इस श्रृंखला को पटना से प्रकाशित दैनिक "दस्तक प्रभात", "लोकोत्तर" सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित किया जा रहा है। हार्दिक आभार-
■ #बालसाहित्य_के_शुभचिंतकों #रचनाकारों_से_निवेदन_है_कि_हमारे_इस_प्रयास_पर_अपनी_बेबाक_टिप्पणी_देकर_अनुग्रहित_करावें। आभारी रहेंगे।
● वर्ष 2021 में प्रकाशित बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की ये समिक्षाएँ एक संग्रह के रूप में प्रकाशित होगी और #वर्ष_2021_का_बाल_साहित्य_एवं_उम्मीद आलेख में भी परिचय प्रकाशित होगा। तथा वर्ष की दो श्रेष्ठ बालसाहित्य कृतियों को 'डॉ. राष्ट्रबन्धु बालसाहित्य सम्मान' एवं 'डॉ. श्रीप्रसाद बालसाहित्य सम्मान' से #सम्मानित भी किया जाएगा।अतः ज्यों-ज्यों रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हो, हमें दो प्रति रजिस्टर्ड डाक से इस पते पर भिजवाते रहिएगा-
◆ राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन, आकोला -312205, (चित्तौड़गढ़) राजस्थान, मोबाइल : 9828219919
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वर्ष 2021 का बाल साहित्य -22
शिशुओं के लिए उद्देश्य पूर्ण करती : 'सागर में गागर'
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समीक्ष्य कृति : 'सागर में गागर' (शिशुओं की कहानी)
लेखक : श्री गोविंद शर्मा , संगरिया
प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत,5- इंस्टिट्यूशनल एरिया, फेज-।।, नेहरू भवन, वसंत कुंज, नई दिल्ली -110070
द्वितीय संकरण : 2021, मूल्य : 35 रुपये मात्र
समीक्षक : राजकुमार जैन राजन, आकोला (राज.)
मोबाइल न. 9828219919
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बाल साहित्य ही है जो पाठ्य पुस्तकों से इतर बच्चों को खेल-खेल में बहुत सारी अवधारणाओं, परम्पराओं, संस्कारों के प्रति समझ बढ़ाने में सहायक होता है। बाल साहित्य ही वह सहायक सामग्री है जिसकी सहायता से बच्चे की मौखिक भाषा-शैली संवर सकती है। बच्चों में संवाद अदायगी का विस्तार हो सकता है और शब्द ज्ञान बढ़ता है ... बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे कल्पना लोक में विचरण करते है इससे उनमें सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है ।
बच्चों के भविष्य निर्माण में पुस्तकों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। कहानी सुनने, पढ़ने से उनके भीतर जिज्ञासा जागृत होती है। कहानी बाल साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। बच्चे सहज ही कहानी से तादात्म्य स्थापित कर लेते है। बच्चों के लिए लगभग 38 पुस्तकें लिख चुके, राजस्थान साहित्य अकादमी, केंद्रीय साहित्य अकादमी, प्रकाशन विभाग द्वारा सर्वोच्च बाल साहित्य सम्मान से सम्मानित राजस्थान के संगरिया निवासी वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री गोविंद शर्मा की शिशु वय के बालकों के लिए एक सुंदर चित्रों से सजी रोचक कहानी की पुस्तक "सागर में गागर " को 'नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने प्रकाशित किया है, जिसका द्वितीय संस्करण हाल ही में प्रकाशित हुआ है। कहानी को सुंदर सजीव-से चित्रों से सजाया है-चित्रकार अबिरा बंदोपाध्याय ने।
इस पुस्तक में एक गागर (मटके) की खूबसूरत कहानी है जो धरती से सागर तक कि यात्रा करता हुआ फिर कैसे धरती पर पहुंचता है? अपनी इस यात्रा में गागर नाले से नदी और नदी से समुद्र में पहुंच जाता है। रास्ते की रोचक घटनाओं का वर्णन इस पुस्तक को बार बार पढ़ने को प्रेरित करता है। गागर के साथ मछलियों, चिड़िया और दो दोस्तों का बहुत मनभावन घटनाक्रम लेखक ने निर्मित किया है। गागर छोटी मछलियों को कैसे सुरक्षा प्रदान करती है। आगे की यात्रा में सागर में भटक गई चिड़िया उस गागर पर संरक्षण लेती है। वहीं चिड़िया ने बनाये अपने आशियाने में अंडे दे दिए। एक दिन तूफान आया तो गागर संग चिड़िया व उसके बच्चे भी किनारे पहुंच गए। कुछ बच्चों ने दया भाव दिखा घोंसले को किनारे के पेड़ पर रख दिया और गागर को अपने घर ले गए। घर से सागर होती हुई फिर घर पहुंचने की घटना के द्वारा नन्हे बच्चों के मन में कई प्रकार की सीख-संस्कारों का बीजारोपण भी कर दिया।
इस कहानी के कुछ वाक्य देखिए- 'उसे छोटी नदी कहो या नाला' ... 'अब उसे यहां घर जैसा कोई प्राणी नहीं दिखाई दिया' ... 'जिधर भी हवा के झोंके ले जाते, उधर ही चली जाती' ... ' दोनों छोटी मछलियों की जान बच गई' ... ' लगा, चिड़िया उड़ते उड़ते थक गई है, वह कहीं बैठना चाहती है' ... 'पर छोटी मछलियां नाराज़ नहीं हुई... छोटी मछलियों ने खुशी-खुशी गागर का मैदान चिड़िया के लिए छोड़ दिया' ...' रुपये पैसों के खजाने से भी कीमती है यह खजाना'... 'दोनों ने चिड़िया के बच्चों को बचाने की सोच ली' ... ' बच्चे गागर को भी अपने साथ घर ले आये' ... और कहानी का सार बताते अंतिम वाक्य - ' गागर इस लिए भी खुश थी कि पहले उसने छोटी मछलियों को बचाया, फिर चिड़िया और उसके अंडे को बचाया। अब फिर से घर के लोंगों को साफ पानी पिला रही है। सबका भला करने वाला खुश तो रहता ही है।''
बाल मन और बाल मनोविज्ञान के गहन पारखी श्री गोविंद शर्मा जी ने इस कहानी को घटना प्रधान शिल्प में इस तरह रचा है कि बालकों को गागर, नदी, नाला, समुद्र, मछली, हवा, चिड़िया, बच्चे, धरती, पेड़ के बारे में जानकारी देते हुए दयालुता, मित्रता, मदद करने आदि के संस्कार भी देने का सफल प्रयास किया है। बहुत ही सरल, सरस व हृदय ग्राही भाषा में लिखी यह कहानी रोचक व मनोरंजक है। शिशुओं सहित हर वय के बाल पाठकों को पसंद आने वाली कहानी है।सुंदर चित्रांकन के कारण कहानी मुंह बोलती-सी लगती है।जो बच्चों को सहज ही याद हो जाएगी। कहानी में अन्तर्निहित तत्व, रोचकता, सहजता, कौतुहल, प्रेरणा तथा रसात्मकता बच्चे की मानसिक क्षुधा को शांत करती है। बालमन की कोमलता, निश्छलता, सोच और कल्पनाओं तक अपनी पहुँच बनाने में कहानीकार सफल रहे हैं।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत सरकार का उपक्रम हैं। बच्चों के लिए कई पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। श्री गोविंद शर्मा जी व पुस्तक न्यास को इस उत्कृष्ट कृति के लिए हार्दिक बधाई एवं मंगलकामना।
◆ राजकुमार जैन राजन
चित्रा प्रकाशन
आकोला -312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान
मोबाइल : 9828219919
ईमेल -
[email protected]
29/08/2021
● वर्ष 2021 का बाल साहित्य: समीक्षा श्रृंखला-21
इस श्रृंखला के तहत आज प्रस्तुत है वरिष्ट रचनाकार #डॉ_फकीर_चंद_शुक्ला , , के बाल कहानी संग्रह #हो_गया_उजाला की समीक्षा/परिचय। इस श्रृंखला को पटना से प्रकाशित दैनिक "दस्तक प्रभात" सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित किया जा रहा है। हार्दिक आभार-
■ #बालसाहित्य_के_शुभचिंतकों #रचनाकारों_से_निवेदन_है_कि_हमारे_इस_प्रयास_पर_अपनी_बेबाक_टिप्पणी_देकर_अनुग्रहित_करावें। आभारी रहेंगे।
● वर्ष 2021 में प्रकाशित बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की ये समिक्षाएँ एक संग्रह के रूप में प्रकाशित होगी और #वर्ष_2021_का_बाल_साहित्य_एवं_उम्मीद आलेख में भी परिचय प्रकाशित होगा। तथा वर्ष की दो श्रेष्ठ बालसाहित्य कृतियों को 'डॉ. राष्ट्रबन्धु बालसाहित्य सम्मान' एवं 'डॉ. श्रीप्रसाद बालसाहित्य सम्मान' से #सम्मानित भी किया जाएगा।अतः ज्यों-ज्यों रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हो, हमें दो प्रति रजिस्टर्ड डाक से इस पते पर भिजवाते रहिएगा-
◆ राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन, आकोला -312205, (चित्तौड़गढ़) राजस्थान, मोबाइल : 9828219919
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वर्ष 2021 का बाल साहित्य -21
उम्मीद की किरण जगाती है बाल कहानियाँ : 'हो गया उजाला'
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पुस्तक का नाम - हो गया उजाला (किशोरोपयोगी बाल कहानियाँ)
लेखक - डॉ. फकीरचंद शुक्ला
प्रकाशक - वनिका पब्लिकेशन, एन. ए. 168, वनिका पब्लिकेशन, विष्णु गार्डन, नई दिल्ली- 110018
प्रकाशन वर्ष - 2021, मूल्य: रु. 100/-
समीक्षक : डॉ. अलका जैन 'आराधना', जयपुर
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आजकल बच्चों के लिए बहुत कुछ लिखा जा रहा है। किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए भी इन दिनों बहुत-सी पुस्तकेंआ रही हैं। महामारी के इस दौर में बच्चे हैरान-परेशान हैं... खेलना कूदना कम हो गया है और ऑनलाइन पढ़ाई बच्चों को ज्यादा रास नहीं आ रही। ऐसे में बच्चों को संस्कारित करने के लिए अच्छा साहित्य पढ़ने की प्रेरणा देना जरूरी है। किशोरावस्था तक आते-आते बच्चों में एक सामान्य समझ विकसित हो जाती है और इस समझ को परिपक्व बनाने में किशोरों के लिए लिखी गई कहानियाँ बहुत उपयोगी हो सकती हैं। इंटरनेट के इस युग में आजकल बच्चों से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। प्रश्न सिर्फ चुनाव का है कि बच्चों को अपने लिए क्या चुनना है ? हमारे किशोरों को आज मार्गदर्शन की बहुत आवश्यकता है पर यह मार्गदर्शन दोस्ताना होना चाहिए... उपदेश एक सीमा तक ही कारगर हो पाते हैं। माता पिता से किए गए आत्मीय संवाद से किशोर संबल पाते हैं, परिवार से जीवन में रौनक बनी रहती है... दोस्त जीने की उमंग जगाते हैं और अच्छी किताबें किशोरों को जीने की राह दिखाती हैं।
ऐसी ही एक किशोर उपयोगी पुस्तक है सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ.फकीरचंद शुक्ला की 'हो गया उजाला ' इस किताब का शीर्षक आकर्षित करता है और प्रेरित भी। इसका मुखपृष्ठ उगते सूरज की आभा को प्रकृति की अदभुत चित्रकारी के साथ प्रस्तुत करता है । डॉ. शुक्ला पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हैं और फूड टेक्नोलॉजी में पीएचडी हैं। इस किशोर उपयोगी कहानी संग्रह में अपने आहार-विज्ञान संबंधी ज्ञान को कहानियों का आकार देने में लेखक ने सफलता पाई है ।
आज के किशोरों के जीवन के दो प्रमुख स्तंभ है -आहार और विचार। इस पुस्तक में इन दोनों को केंद्र बनाकर एक से बढ़कर एक कहानियाँ रची गई हैं। इन कहानियों में विविधता तो है ही... साथ ही पाठकों को बांधे रखने की क्षमता भी है। इस पुस्तक में कुल 6 कहानियां हैं। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें उपदेशात्मक भाव कहीं भी नहीं है। इन कहानियों में बच्चे अपने अनुभवों से सीखते हैं और अपनी गलतियों से सबक भी लेते हैं। कहानियों में अपनी गति है और लय भी... इसीलिए ये कहानियाँ कहीं भी बोझिल नहीं होती और सरस बनी रहती हैं।
पहली कहानी 'दृढ़ निश्चय' में बच्चों में फास्ट फूड के प्रति बढ़ते आकर्षण को केंद्र में रखते हुए बहुत ही प्रभावशाली ढंग से इसके दुष्प्रभाव पर प्रकाश डाला गया है। दूसरी कहानी 'हिम्मत ' में आज बच्चों में ट्यूशन की बढ़ती प्रवृत्ति के नुकसानों को बहुत ही विश्वसनीय ढंग से बताया गया है।दरअसल ट्यूशन की प्रवृत्ति एक दीमक की तरह है जो बच्चों के दिलों-दिमाग को खोखला कर देती है।
पुस्तक की तीसरी कहानी 'सही राह' बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण और अस्वास्थ्यकर खान-पान के कारण आ रहे हैं मोटापे को लेकर लिखी गई है। इसमें यही बताया गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है ।
बच्चों के लिए व्यायाम और खेलकूद की आवश्यकता को निरूपित करती यह कहानी बहुत सुंदर बन पड़ी है । 'उजाला' कहानी बच्चों में मोबाइल की और मोबाइल गेम्स की बढ़ती लत पर करारी चोट करती है। मोबाइल में गेम खेलने से दिलो-दिमाग और शरीर पर होने वाले कुप्रभावों को इस अंदाज में प्रस्तुत किया गया है कि बच्चों को स्मार्टफोन दिए जाने की उपादेयता के बारे में पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है। यदि उन्हें मोबाइल दिया भी जाए तो यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है कि बच्चे उसका उपयोग कैसे करते हैं? 'जन्मदिन' कहानी आज के बच्चों में नैतिक मूल्यों के बीजारोपण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी है ।
आजकल जन्मदिन पर दोस्तों को बड़े होटल में पार्टी देने का चलन है। इस कहानी में समीर होटल में पैसे बर्बाद करने के बजाय अपना जन्मदिन मनाने के लिए मिलने वाले रुपयों को उपेक्षित बच्चों के भले के लिए खर्च करता है। 'धन्यवाद अराध्य' कहानी भी नैतिक मूल्यों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह जीव दया का भाव मन में जगाती है और बच्चों को यह भी सिखाती है कि सभी का जीवन अनमोल है।
पुस्तक की भाषा अत्यंत प्रभावी है और छपाई भी आकर्षक है। लेखक अपने परिवेश के प्रभाव से अछूते नहीं रह पाए हैं और भाषा पर यह प्रभाव उनकी कहानियों के सौंदर्य में चार चांद लगाता है। किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए एक सार्थक पुस्तक के सृजन हेतु डॉक्टर फकीर चंद शुक्ला को हार्दिक बधाई।
●डॉ. अलका जैन 'आराधना'
जयपुर ।