18/11/2025
👩🏻 70 सालों से भारतीय मुद्रा पत्र (नोट) पर केवल गांधीजी का ही चित्र लगा था, इसके साथ जनता के मन में यह सोच भी पिरो दी गई के केवल चरके से आजादी आई थी। अहिंसा का ऐसा इंद्रजाल रचा गया के अंग्रेजों से आजादी सिर्फ गांधीजी की अहिंसा का ही परिणाम हैं। शेष भारत केवल हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा🤨।
🤦🏻♀️ सोचिए जरा !! भारतीय स्वतंत्रता के लिए आहूत हुए हर उस "प्राण" का कैसा अपमान हैं ये?
🤔अंग्रेजों के अन्याय, निश्रृंस अत्याचार, हत्या, सश्रम दंड, कारावास, फांसी आदि की भी परवाह न करते हुए कितने ही मां भारती के सपूतों ने असंख्य बलिदान दिए। जिनके साहस, शौर्य, राष्ट्र प्रेम का उल्लेख तो दूर की बात हैं, षडयंत्र पूर्वक ऐसे जननायक को जनस्मृति से मिटने के लिए इतिहास की पुस्तकों से लेकर भारतीय नोट तक में केवल गांधीजी को ही मूल नायक बना दिया।
साथ ही अगली पीढ़ी भी इस तथ्य को नकार न सके इसलिए गांधीजी को ही "राष्ट्रपिता" बना दिया गया। 👏🏻 वाह भाई वाह गजब की व्यक्ति निष्ठा है यह तो। पूरा राष्ट्र एक तरफ और गांधीजी एक तरफ। राजनीतिक मजबूरी के कारण गांधीजी बनाम भारत का यह खेल आज भी बदस्तूर जारी हैं।
👩🏻🏫 पर अब बहुत हो गया गुलाम मानसिकता की हद पार हो गई, अगर राष्ट्रपिता किसी को मानना ही था, तो महाराज दुष्यंत एवं शकुंतला पुत्र "चक्रवर्ती सम्राट भरत" को ही राष्ट्रपिता घोषित करते, जिनके नाम से आज आर्यावर्त का यह भू-भाग "भारतवर्ष" के नाम से जाना जाता हैं, जिसका साक्ष्य परंपरा, शास्त्र, और इतिहास तीनों देते हैं, पर नहीं साहब !! हमें तो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में स्वघोषित राष्ट्रपिता चाहिए, जिससे हमारी पीढ़ी इस मनगढ़त तथ्य "गांधीजी बनाम शेष भारत" को ही सत्य मान लें, और अहिंसा को ही सर्वोच्च सिद्धांत मान न्याय की मूल परिभाषा सज्जनों का संरक्षण एवं दुर्जनों को दण्ड देना भूल जाए।
सोचिए कितना गहरा दुर्लक्ष्य कितना गहरा षडयंत्र, पर अब जनता के सामने सब झूठों का पर्दाफाश हो चुका हैं। अब शिक्षा, न्याय, चिकित्सा, सनातन संस्कृति के अनुसार होगी। इतिहास का पुनर्लेखन एवं सत्यापन किया जाएगा, इसी तरह भारतीय मुद्रा पत्र (नोट) पर या तो महापुरुषों की छबि उकेरी जाएगी या फिर मां भारती की छबि होगी।
🧘🏻♀️ क्योंकि भारतीय जनमानस आज भी अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तथेव च इस पूरे श्लोक में श्रद्धा रखते हैं, न कि अधूरे वाक्य में। साथ ही हम सनातनियों के लिए आज भी हमारे नायक कोई "महात्मा" न होकर "स्वयं श्री कृष्णजी" है, जिनके द्वारा कही गई गीता में उद्धृत उपदेश आज भी हमारी संस्कृति एवं रणनीति के मूल हैं।
👩🏻 मित्रों आपका इस विषय में क्या राय है, क्या भारतीय नोट पर भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतिभिंब दिखना चाहिए या गांधीजी बनाम शेष भारत रहना चाहिए? यह प्रश्न में भारतीय जनता को समर्पित करती हूं और मुझे आशा है के मेरे आग्रह पर देश की जनता उत्तर देकर नये इतिहास की नींव रखेगी। वंदे मातरम।
*सविनय - अनामिका चक्रवर्ती "मासूम/निश्छल"*😌🙏🏻