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*वैशाख के महीने में श्री तुलसी जल दान का महत्व।* वैशाख के महीने में क्योंकि सूर्य के ताप में वृद्धि हो जाती है इसलिए विष...
21/04/2022

*वैशाख के महीने में श्री तुलसी जल दान का महत्व।*

वैशाख के महीने में क्योंकि सूर्य के ताप में वृद्धि हो जाती है इसलिए विष्णु के भक्तगणों को जल दान करने से श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भगवान श्री हरि कृपा करके उनसे अभिन्न तुलसी वृक्ष को जल दान का एक सुयोग अथवा शुभ अवसर प्रदान करते हैं लेकिन तुलसी को जल दान क्यों करना चाहिए ?

तुलसी श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं। उनकी कृपा के फल से ही हम भगवान श्री कृष्ण की सेवा का अवसर प्राप्त कर सकते हैं। तुलसी देवी के संबंध में कहा गया है तुलसी के दर्शन मात्र से ही संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, जल दान करने से यम भय दूर हो जाता है, रोपण करने से यानी उनको बोने से उनकी कृपा से कृष्ण भक्ति वृद्धि होती है और श्रीहरि के चरण में तुलसी अर्पण करने से कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है।

पद्मपुराण के सृष्टि खंड में वैष्णव श्रेष्ठ श्री महादेव अपने पुत्र कार्तिक को कहते हैं -

"सर्वेभ्य पत्र पुस्पेभ्य सत्यमा तुलसी शीवा सर्व काम प्रदत्सुतधा वैष्णवी विष्णु सुख प्रिया।"

समस्त पत्र और पुष्प में तुलसी सर्वश्रेष्ठ हैं। तुलसी सर्व कामना प्रदान करने वाली, मंगलमय, श्रुधा, शुख्या, वैष्णवी, विष्णु प्रेयसी एवं सभी लोको में परम शुभाय् है।

भगवान शिव कहते हैं -

"यो मंजरी दलरे तुलस्या विष्णु मर्त्ये तस्या पुण्य फलम कर्तितुम नैव शक्तते,
तत्र केशव सानिध्य यात्रस्ती तुलसी वनम तत्रा ब्रह्म च कमला सर्वदेवगने।"

हे कार्तिक! जो व्यक्ति भक्ति भाव से प्रतिदिन तुलसी मंजरी अर्पण कर भगवान श्रीहरि की आराधना करता है यहां तक कि मैं भी उसके पुण्य का वर्णन करने में अक्षम हूं। जहां भी तुलसी का वन होता है भगवान श्री गोविंद वही वास करते हैं और भगवान गोविंद की सेवा के लिए लक्ष्मी ब्रह्मा और सारे देवता वही वास करते हैं।

मूलतः भगवान श्री कृष्ण ने जगत में बध जीव गणों को उनकी सेवा करने का शुभ अवसर प्रदान करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ही तुलसी रूप में आविर्भूत हुए हैं एवं उन्होंने तुलसी पौधे को सर्वाधिक प्रिय रूप में स्वीकार किया है। पाताल खंड में यमराज ब्राह्मण को तुलसी की महिमा का वर्णन करते हैं -

वैशाख में तुलसी पत्र द्वारा श्री हरि की सेवा के प्रसंग में वह कहते हैं कि जो व्यक्ति संपूर्ण वैशाख मास में अनन्य भक्ति भाव से तुलसी द्वारा त्री संध्या भगवान श्रीकृष्ण की अर्चना करता है उस व्यक्ति का और पुनर्जन्म नहीं होता।

तुलसी देवी की अनंत महिमा अनंत शास्त्रों में अनंत शास्त्रों में वर्णित है लेकिन यह महिमा असीमित है, अनंत है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्रकृति खंड में ऐसा वर्णन है -

"शिरोधार्य च सर्वे सामीप सताम विश्व पावनी जीवन मुक्ता मुक्तिदायिनी चा भजेताम हरि भक्ति दान।"

जो सबके शिरोधार्य है, उपासया है, जीवन मुक्ता है, मुक्ति दायिनी है और श्री हरि की भक्ति प्रदान करने वाली हैं, वह समस्त विश्व को पवित्र करने वाली हैं। ऐसी समस्त विश्व को पवित्र करने वाली विश्व पावनी तुलसी देवी को मैं सादर प्रणाम करता हूं🙏

समग्र वैदिक शास्त्रों के संकलन करने वाले तथा संपादक श्री व्यास देव तुलसी की महिमा करते हुए पद्मपुराण के सृष्टि खंड में कहते हैं -

"पूजन कीर्तने ध्याने परोपने धारने कलो तुलसी ध्यते पापं स्वर्ग मोक्ष दादाती,
उपदेशम दृश्य दृष्या स्यम आचरते पुनः स याति परम अनुस्थनाम माधवसे के कनम्।"

तुलसी देवी की पूजा, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण पाप को नाश करने वाला होता है और इससे परम गति प्राप्त होती है।

जो व्यक्ति किसी अन्य को तुलसी द्वारा भगवान श्री हरि की अर्चना करने का उपदेश देता है और स्वयं भी अर्चना करता है वही वह श्री माधव के धाम में गमन करता है। केवल तुलसी देवी के नाम उच्चारण मात्र से ही श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं और इसके परिणाम स्वरूप पाप समूह नष्ट हो जाता है और अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

पदम् पुराण के ब्रह्म खंड में कहां गया है -

"गंगाताम सरिता श्रेष्ठ: विष्णु ब्रह्मा महेश्वरा:
देव: तीर्थ पुष्करा तेश्थ्यम तुलसी दले।"

गंगा आदि समस्त पवित्र नदी एवं ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुष्कर आदि समस्त तीर्थ सर्वथा तुलसी दल में विराजमान रहते हैं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि;

समस्त पृथ्वी में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वह तुलसी उद्विग्न के मूल में तीर्थ निवास करते हैं। तुलसी देवी की कृपा से भक्तवृंद कृष्ण भक्ति प्राप्त करते हैं और वृंदावनवास की योग्यता अर्जित करते हैं। वृंदादेवी तुलसीदेवी समस्त विश्व को पावन करने में सक्षम है और सब के द्वारा ही पूज्य है।

समस्त पुष्पों के मध्य वो सर्वश्रेष्ठ हैं और श्री हरि सारे देवता, ब्राह्मण और वैष्णवगण के आनंद का वर्धन करने वाली हैं। वे अतुलनीय और कृष्ण की जीवन स्वरूपनी हैं। जो नित्य तुलसी सेवा करते हैं वह समस्त क्लेश से मुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करते हैं। अतः श्रीहरि की अत्यंत प्रिय तुलसी को जल दान अवश्य करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त इस समय भगवान से अभिन्न प्रकाश श्री शालिग्राम शिला को भी जल दान की व्यवस्था की जाती है।

शास्त्रों में तुलसी देवी को जल दान करने पर तुलसी के मूल में जो जल बच जाता है उसका भी विशेष महत्व वर्णित किया गया है। इस विषय में एक कहानी बताई गई है -

एक समय एक वैष्णव तुलसी देवी को जल प्रदान कर और परिक्रमा करके घर वापस जा रहे थे कि कुछ समय पश्चात एक भूखा कुत्ता वहां आकर तुलसी देवी के मूल में पड़े हुए जल था उसको पीने लगा लेकिन तभी वहां एक बाघ आया और उसको कहने लगा - दुष्ट कुकुर! तुम क्यों मेरे घर में खाना चोरी करने आए हो और चोरी भी करना ठीक है लेकिन मिट्टी का बर्तन क्यों तोड़ कर आए हो? तुम्हारे लिए उचित दंड केवल मृत्युदंड है।

इसके उपरांत बाघ उस कुत्ते को वही मार देता है और तभी यमदूत के गण उस कुत्ते को लेने आते हैं लेकिन उसी समय विष्णु दूतगण वहां आते हैं और उनको रोकते हैं।

कहते है यह कुत्ता पूर्व जन्म में जघन्य पाप करने के कारण नाना प्रकार के दंड पाने के योग्य हो गया था लेकिन केवल तुलसी के पौधे के मूल में पड़े जल का पान करने के फल से उसका समस्त पाप नष्ट हो चुका है और तो और वह विष्णु गमन करने की योग्यता अर्जित कर चुका है अतः वह कुत्ता सुंदर रूप को प्राप्त करता है और वैकुंठ के दूत गणों के साथ भगवद् धाम गमन करता है।

जगत जीवों को कृपा करने के उद्देश्य से ही भगवान की अतरंगशक्ति श्रीमती राधारानी का प्रकाश वृंदा तुलसी देवी के रूप में इस जगत में प्रकट हुआ है। उसी प्रकार भगवान श्री हरि भी बद्ध जीवो को माया के बंधन से मुक्त करने के लिए विचित्र लीला के माध्यम से अपने अभिन्न स्वरुप शालिग्राम शिला रूप में प्रकाशित हुए हैं। चारों वेदों के अध्ययन से लोगों को जो फल प्राप्त होता है केवल शालिग्राम शिला के अर्चना करने मात्र से ही वह पूर्ण फल प्राप्त किया जाना संभव है जो शालिग्राम शिला के स्नान जल, चरणामृत आदि को नित्य पान करते हैं वह महा पवित्र होते हैं एवं जीवन के अंत में भगवद धाम गमन करते हैं।



जय मां तुलसी🌹
जय श्री हरि विष्णु जी।
🙏🙏

हवन कुंड और हवन के नियम::::::::::::::::हवन कुंड और हवन के नियम :::::::::::::::::=========== =======================हवन च...
25/02/2022

हवन कुंड और हवन के नियम
::::::::::::::::हवन कुंड और हवन के नियम :::::::::::::::::
=========== =======================
हवन चाहे वैदिक हो या तांत्रिक उसके लिए हवन कुंड कि भूमि, वेदी का निर्माण एक
आवश्यक अंग होता है| कहा है , कुंड, वेदी और निमंत्रित देवी देवताओं कि तथा पूर्ण सज्जा कि रक्षा करता है, उसे मंडल कहा जाता है| यज्ञ कि भूमि का चुनाव बहुत जरूरी है| उत्तम भूमि --नदियों के किनारे, संगम, देवालय, उद्यान, पर्वत, गुरु ग्रह और ईशान मैं बना हवन कुंड सर्वोत्तम माना गया है| फटी भूमि, केश युक्त और सर्प कि बाम्बी वाली भूमि वर्जित है| हवन कुंड मैं तीन सीढिया होती हैं| इन सीढियो को ''मेखला'' भी कहा जाता है| सबसे ऊपर कि मेखला सफ़ेद [WHITE ] मध्य कि मेखला लाल [RED]और नीचे कि मेखला काले [BLACK ] रंग कि होती है| इन तीन मेखलाओं मैं तीन देवताओं का निवास माना जाता है| उपर विष्णु मध्य मैं ब्रह्मा तथा नीचे शिव का वस् होता है| जब हम आहूतिया डालते हैं तो कुछ सामग्री बाहर गिर जाती है| हवन के उपरांत उस सामग्री को कुछ लोग पुन: हवन कुंड मैं डाल देते हैं, ऐसा कभी नहीं करना चाहिय| कहा गया है ऊपर गिरी सामग्री को छोड़ कर शेष दो मेखलाओं पर गिरी हुई हवन सामग्री वरुण देवता का हिस्सा होती है, इसलिये उसे वरुण देवता को अर्पित कर देना चाहिए अग्नि देवता को नहीं| हाँ, ऊपरकी मेखला पर गिरी सामग्री को पुन: हवन कुंड मैं दल देना चाहये| वैदिक प्रयोग के साथ ही साथ तंत्र मैं भी विभिन्न यंत्र प्रयोग मैं लाये जाते हैं| उनमे से कुछ त्रिकोण होते हैं| तंत्र मार्ग मैं त्रिकोण कुंड का प्रयोग होता है| हवन कुंड अनेक प्रकार के होते हैं जैसे - वृत्ताकार , वर्गा कार, त्रिकोण और अष्ट कोण आदि| सभी प्रकार के यज्ञों, मानव कल्याण से संबंधित सभी प्रकार के हवनों ''मृगी” मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए| हवन का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि किसी भी प्रकार से हवन सामग्री कुंड मैं डाल दी जाये| हवन मैं शास्त्र आज्ञा, आचार्य आज्ञा और गुरु आज्ञा का पालन करना जरूरी होता है| आप इस बात पर विश्वास रखें मेरे करने से कुछ नहीं होगा गुरु करे सो होए| हवन रोग नाशक, ताप नाशक, वातावरण को शुद्ध करने वाला यज्ञ से ओक्सिजन कि मात्रा बढ़ जाती है| हमे यह ज्ञान अपने प्राचीन ग्रंथों और ऋषिओं से प्राप्त होता है |
१. आहुति के मान से मण्डप-निर्णय होने के पश्चात वेदिका के बाहर तीन प्रकार से क्षेत्र का विभाग करके मध्यभाग में पूर्व आदि दिशाओं को कल्पना करे । फिर आठों दिशाओं में-[मुक्ति मार्ग ] आठ दिशाओं के नाम इस प्रकार हैं- पूर्व ,अग्नि, दक्षिण, निर्ऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा ईशान ।
२.
३. क्रमशःचतुरस्र, योनि अर्धचन्द्र, त्र्यस्र, वर्तुल, षडस्र, पङ्कज और अष्टास्रकुण्ड की स्थापना सुचारु रूप से करे तथा मध्य में आचार्य कुण्ड वृत्ताकार अथवा चतुरस्र बनाये । पचास अथवा सौ आहुति देनी हो तो कुहनी से कनिष्ठा तक के माप का (१ फुट ३ इंच) कुण्ड बनाना, एक हजार आहुति में एक हस्तप्रमाण (१ फुट ६ इंच) का, एक लक्ष आहुति में चार हाथ का (६ फुट), दस लक्ष आहुति में छः हाथ (९ फुट) का तथा कोटि आहुति में ८ हाथ का (१२ फुट) अथवा सोलह हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये । भविष्योत्तर पुराण में पचास आहुति के लिये मुष्टिमात्र का भी र्निदेश है । इस विषय में शारदातिलक, स्कन्दपुराण आदि का सामान्य मतभेद भी प्राप्त होता है । कुण्ड के निर्माण में अङ्गभूत वात, कण्ठ, मेखला तथा नाभि का प्रमाण भी आहुति एवं कुण्ड की आकृति के आधार से निश्चिम किये जाते हैं । इस कार्य में न्यूनाधिकार होने से रोगशोक आदि विघ्न आते हैं । अतः केवल सुन्दरता पर ही दृष्टि न रख कर शिल्पी के साथ पूर्ण पिरश्रम से शास्त्रानुसार कुण्ड तैयार करवाना चाहिये । यदि कुण्ड करने का सार्मथ्य न हो, तो सामान्य हवनादि में विद्वान चार अंगुल ऊँचा, अथवा एक अंगुल ऊँचा एक हाथ लम्बा-चौड़ा सुवर्णाकार पीली मिट्टी अथवा वालू-रेती का सुन्दर स्थण्डिल बनाये । इसके अतिरिक्त ताम्र के और पीतल के भी यथेच्छ कुण्ड बाजार में प्राप्त होते हैं । उनमें प्रायः ऊपर मुख चौड़ा होता है और नीचे क्रमशः छोटा होता है । वह भी शास्त्र की दृष्टि से ग्राह्य है । नित्य हवन-बलिवैश्व-देव आदि के लिए अनेक विद्वान इन्हें उपयोग में लेते हैं |.मुक्ति मार्ग ] ................................................................हर-हर महादेव

क्या कभी आप  हरिद्वार गए हैं ???यहाँ के पण्डे आपके आते ही आपके पास पहुँच कर आपसे सवाल करेंगे...आप किस जगह से आये है??मूल...
23/02/2022

क्या कभी आप हरिद्वार गए हैं ???
यहाँ के पण्डे आपके आते ही आपके पास पहुँच कर आपसे सवाल करेंगे...
आप किस जगह से आये है??
मूल निवास, जाति गौत्र आदि पूछेंगे और धीरे धीरे पूछते पूछते आपके दादा, परदादा ही नहीं बल्कि परदादा के परदादा से भी आगे की पीढ़ियों के नाम बता देंगे जिन्हें आपने कभी सुना भी नही होगा...
और ये सब उनकी सैंकड़ो सालों से चली आ रही किताबो में सुरक्षित है...
विश्वास कीजिये ये अदभुत विज्ञान और कला का संगम है...
आप रोमांचित हो जाते है जब वो आपके पूर्वजों तक का बहीखाता सामने रख देते हैं...
आपके पूर्वज कभी वहाँ आए थे और उन्होंने क्या क्या दान आदि किया...

लेकिन आजकल के बच्चे इन सब बातों को फ़िज़ूल समझते हैं उन्हें लगता है कि ये पण्डे सिर्फ लूटने बैठे हैं जबकि ऐसा नही है...

ये तीर्थो के पण्डे हमारी सभ्यता,संस्कृति के अटूट अंग है इनका अस्तित्व हमारे पर ही है...
अपनी संस्कृति बचाइए और इन्हें सम्मान दीजिये...

वैसे हिन्दुओ के नागरिकता रजिस्टर हैं ये लोग...
पीढ़ियों के डेटा इन्होंने मेहनत से बनाया और संजोया है...
इन्हें सम्मान दीजिये...

14/01/2022

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ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समा...
19/11/2021

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर :------

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं।

ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है।

ऋषि शब्द का अर्थ

ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि।

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है।

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।

मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।

मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं।

मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं

साधु कौन होते हैं

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।

कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।

साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं।

संन्यासी किसे कहते हैं

सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है।

सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है।

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है

परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे।

परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है।

यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है।

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

विशालकाय प्राचीन श्री यंत्रस्थान : बोरोबुदुर, जावा टेंगहा, इंडोनेशिया (अभी मुस्लिम देश है )
08/09/2021

विशालकाय प्राचीन श्री यंत्र

स्थान : बोरोबुदुर, जावा टेंगहा, इंडोनेशिया (अभी मुस्लिम देश है )

04/09/2021
पूरी दुनिया के लोग मिस्र की राजाओं के मृत शरीर (ममी) और भारत में गोवा में सेंट जेवियर के संरक्षित शरीर को देख हैरान हैं....
02/09/2021

पूरी दुनिया के लोग मिस्र की राजाओं के मृत शरीर (ममी) और भारत में गोवा में सेंट जेवियर के संरक्षित शरीर को देख हैरान हैं. बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि मिस्र के राजाओं के मृत शरीर, जिस वस्त्र में लपेटे जाते थे। मसलिन भारतवर्ष से ही आयातित थे। तमिलनाडु कज जिला तिरुचिरापल्ली के श्रीरंगम स्थित "श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर”, जिसे भारत के सबसे बड़े मंदिर-परिसर का गौरव प्राप्त है, में विशिष्टाद्वैतदर्शन के महान आचार्य और श्रीवैष्णव परंपरा के अग्रणी संत स्वामी रामानुजाचार्य (1017-1137) का पद्मासनस्थ भौतिक शरीर विगत 878 सालों से संरक्षित रखा जा रहा है और यहां देखा जा सकता है।

श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के पांचवें परिक्रमा-पथ पर स्थित “श्री रामानुज मंदिर” के दक्षिण-पश्चिम कोने पर यह भौतिक शरीर संरक्षित है। रामानुजाचार्य 120 वर्ष तक जीवित रहे थे। 1137 में उन्होंने पद्मासन अवस्था में ही समाधि ले ली थी। स्वयं श्रीरंगनाथस्वामी के आदेश से उसी अवस्था में रामानुजाचार्य के शिष्यों ने उनके भौतिक शरीर को संरक्षित रख लिया। इस संरक्षित शरीर में आँखें, नाखून आदि स्पष्ट दिखाई देते हैं। सड़न से बचाने के लिए इस शरीर पर रोजाना किसी प्रकार का अभिषेक नहीं किया जाता। वर्ष में दो बार जड़ी-बूटियों से इस शरीर को साफ किया जाता है और उस समय भौतिक शरीर पर चंदन और केसर का आलेपन किया जाता है। उल्लेखनीय बात है की इस पवित्र स्थान का गोवा या मिस्र जैसा कोई प्रचार नहीं किया जाता। रामानुजाचार्य द्वारा इस्तेमाल एक बॉक्स अभी भी मंदिर के अंदर देखा जा सकता है।

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की 🚩 #श्रीकृष्ण_जन्माष्टमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 💐
30/08/2021

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की 🚩
#श्रीकृष्ण_जन्माष्टमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 💐

भारतीय वास्तुकला भगवान विश्वकर्मा जीका देन है जिसके समक्ष आधुनिक विज्ञान पूर्ण रूप से हारा हुआ महसूस करता होगा।क्या कोई ...
20/08/2021

भारतीय वास्तुकला भगवान विश्वकर्मा जीका देन है जिसके समक्ष आधुनिक विज्ञान पूर्ण रूप से हारा हुआ महसूस करता होगा।
क्या कोई इस मंदिर पर बनी देवताओं के मूर्तियों की संख्या गिन कर बता सकता है ?

नहीं ना ? यह केवल मंदिर का 25%हिस्सा है सोचिये मूर्तियों की जिन संख्याओं को हम गिन नहीं सकते उसे हमारे पूर्वजों ने सदियों पहले कैसे बनाया होगा। लेकीन सोची समझी साजिशो के तहत हमे हमारी सभ्यता भुलाने पर मजबुर किया गया है। आएये अपनी सभ्यता को जानते है और उसे पुनर्जीवित करते है।

#सुचिन्द्रम मंदिर, तमिलनाडु

*🌷🌷।।श्रावण विशेष क्यों है।। 🌷🌷*क्‍यों भगवान शिव को जल से है इतना प्रेम? सावन के महीने से क्‍या है शिवजी का संबंध:-सावन ...
06/08/2021

*🌷🌷।।श्रावण विशेष क्यों है।। 🌷🌷*

क्‍यों भगवान शिव को जल से है इतना प्रेम? सावन के महीने से क्‍या है शिवजी का संबंध:-

सावन के महीने में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए श्रृद्धालु दूर-दूर से आते हैं, और शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं। कभी सोचा है कि भगवान शिव को जल से इतना प्रेम क्‍यों है? इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है। आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे खास बातें…

पुराणों के अनुसार मन्दराचल पर्वत को धुरी बनाकर वासुकी नागों से बांधकर समुद्र मंथन सावन में संपन्न किया गया था। समुद्र मंथन से चौदह रत्न प्रकट हुए। इसमें से तेरह रत्नों को सभी देवताओं में बांट दिया गया। समुद्र मंथन से अमृत भी निकला, जिसे सारे देवताओं ने ग्रहण किया। साथ ही श्री की उत्पति भी हुई जिसे भगवान विष्णु ने वरण किया। लेकिन इसके साथ ही हलाहल विष भी निकला। वह विष इतना अधिक तीव्र था कि उसे ग्रहण करने की क्षमता किसी भी देवता, राक्षस में नहीं थी।

तब सब ने मिल कर भगवान शिव से निवेदन किया कि *‘आप ही आद्या शक्ति से युक्त महादेव हैं,* जो इस हलाहल को ग्रहण कर संसार को विष से बचा सकते हैं।’ तब भगवान शिव ने देवताओं के इस आग्रह को स्वीकार कर वह विष हलाहल ग्रहण कर अपने कंठ में रख लिया। इसी कारण भगवान शिव *‘नीलकंठ’* कहलाए। लेकिन विष में अत्यधिक तीव्रता थी, जिस कारण भगवान शिव के शरीर से तीव्र अग्नि निकलने लगी। सारे ब्रह्माण्ड में उष्णता छा गई और देव-दानव मनुष्य हाहाकार करने लगे।

तब भगवान शिव ने शीतलता के लिए अपने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण किया। लेकिन इसके उपरान्त भी विष की तीव्रता कम नहीं हुई। तब सारे देवता विचार-विमर्श करने लगे कि ‘क्या करना चाहिए जिससे विष की ज्वाला कम हो और संसार में फिर से शांति आ सके।’

यह निर्णय लिया गया कि भगवान शिव पर जल धारा प्रवाहित की जाए तो उससे उनका मस्तक थोड़ा शांत होगा और संसार में शांति आ सकती है। स्वर्ग मे सबसे बड़ी गंगा नदी है, और देवताओं ने गंगा नदी को आकाश मार्ग से भगवान शिव के ऊपर प्रवाहित किया और निरन्तर जल धारा प्रवाहित की तब से भगवान शंकर को जलाभिषेक किया जाता है। भगवान शंकर ने गंगा जी को अपने शिर पर धारण कर लिया तब से भगवान गंगाधर कहलाये। श्रावण मास मे वैदिक ब्राह्मण देवता से रूद्राभिषेक पूजन करने का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसीलिए शंकर भगवान को आशुतोष भी कहते हैं।

➖ #नर्मदा_नदी_के_हर_पत्थर_में_है_शिव_आखिर क्यों?➖नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्बन्ध में एक धार्मिक कथा है... ✍️भारतवर्ष में ग...
03/08/2021

➖ #नर्मदा_नदी_के_हर_पत्थर_में_है_शिव_आखिर क्यों?➖

नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्बन्ध में एक धार्मिक कथा है... ✍️

भारतवर्ष में गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती ये चार नदियां सर्वश्रेष्ठ हैं। इनमें भी इस भूमण्डल पर गंगा की समता करने वाली कोई नदी नहीं है। प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया।

प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा।

नर्मदाजी ने कहा - ’ब्रह्मा जी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए।’

ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा - ’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है।'

ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं।

भगवान शंकर उनपर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा।

नर्मदा ने कहा - ’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ? बस आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति बनी रहे।'

नर्मदा की बात सुनकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हो गए और बोले - ’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे। गंगा में स्नान करने पर शीघ्र ही पाप का नाश होता है, यमुना सात दिन के स्नान से और सरस्वती तीन दिन के स्नान से सब पापों का नाश करती हैं परन्तु तुम दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण करने वाली होगी। तुमने जो नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की है, वह पुण्य और मोक्ष देने वाला होगा।’

भगवान शंकर उसी लिंग में लीन हो गए। इतनी पवित्रता पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है ‘नर्मदा का हर कंकर शंकर है।'

🔱हर हर महादेव🐚🌷जय भोलेनाथ बाबा सबका भला करें 🌹

हज़ारो शुद्ध मीठी चीजे जिस देश के लोग बनाना और खाना जानते हो...उस देश में चॉकलेट देकर कुछ मीठा हो जाये कह के करोडों की च...
29/07/2021

हज़ारो शुद्ध मीठी चीजे जिस देश के लोग बनाना और खाना जानते हो...उस देश में चॉकलेट देकर कुछ मीठा हो जाये कह के करोडों की चॉकलेट बेच के, विदेशी...
कम्पनियों का हमारा करोडो रूपया लूट लेना.. ये दर्शाता है कि.... हमारा कितना बौद्धिक पतन हो गया है...

पवित्र सावन माह के पहले सोमवार को सुबह सुबह 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करिए। ॐ नमः शिवाय।
26/07/2021

पवित्र सावन माह के पहले सोमवार को सुबह सुबह 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करिए। ॐ नमः शिवाय।

20/07/2021
लकड़ी के खडाऊं-हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनि धरती की गूढ़ रासायनिक संक्रियाओं को समझते थे, इसलिए उन्होंने खड़ाऊ का आविष्कार क...
17/07/2021

लकड़ी के खडाऊं-
हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनि धरती की गूढ़ रासायनिक संक्रियाओं को समझते थे, इसलिए उन्होंने खड़ाऊ का आविष्कार किया…. आपको गर्व होगा खड़ाऊ के पीछे का विज्ञान जानकर गुरुत्वाकर्षण का जो सिद्धांत वैज्ञानिकों ने बाद मे प्रतिपादित किया उसे हमारे ऋषि मुनियों ने काफी पहले ही समझ लिया था। उस सिद्धांत के अनुसार शरीर में प्रवाहित हो रही विधुत तंरगे गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं
यह प्रक्रिया अगर निरंतर चलें तो शरीर की जैविक शक्ति (वाइटल्टी फोर्स) समाप्त हो जाती है। इसी जैविक शक्ति को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने खडाऊंखडाऊं पहनने की प्रथा आरम्भ की ताकि शरीर की विधुत तरंगों का पृथ्वी की अवशोषण शक्ति के साथ सम्पर्क न हो सके,इसी सिद्धांत के आधार पर खडाऊं पहनी जाने लगी।यें चीजें जानकर गर्व होता है अपने पूर्वजों पर, और दुःख होता है कि आज के तथाकथित सभ्य समाज को अपना इतिहास केवल माइथोलॉजी नजर आता है (कॉपी)
🙏🙏सत्य सनातन 🚩🚩🚩
🙏🙏 धन्य सनातन🚩🚩🚩

.                              निंदा का फल एक बार की बात है की किसी राजा ने यह फैसला लिया के वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों ...
15/07/2021

. निंदा का फल
एक बार की बात है की किसी राजा ने यह फैसला लिया के वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा।

एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी और ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए।
राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।
राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके।
रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा की क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ? ताकि उसके घर रात काटी जा सके।
चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो खूब बंदगी करते हैं। राजा उनके घर रात ठहर गया।
सुबह जब राजा उठा तो लड़की सिमरन पर बैठी हुई थी। इससे पहले लड़की का रूटीन था की वह दिन निकलने से पहले ही सिमरन से उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी।
लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक सिमरन पर बैठी रही।
जब लड़की सिमरन से उठी तो उसके भाई ने कहा की बहन तू इतना लेट उठी है ,अपने घर मुसाफिर आया हुआ है।
इसने नाश्ता करके दूर जाना है। तुझे सिमरन से जल्दी उठना चाहिए था।
तो लड़की ने जवाब दिया कि भैया ऊपर एक ऐसा मामला उलझा हुआ था।
धर्मराज को किसी उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वो फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी, इस लिए देर तक बैठी रही सिमरन पर।
उसके भाई ने पूछा ऐसी क्या बात थी। तो लड़की ने बताया कि फलां राज्य का राजा अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था।
लेकिन सांप के दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए।
अब धर्मराज को समझ नहीं आ रही कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप राजा को लगे, सांप को लगे या दूध नंगा छोड़ने वाले रसोईए को लगे।
राजा भी सुन रहा था। राजा को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ ?
लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था।
राजा ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूं ?
दोनों बहन भाइयों ने खुशी से उसको हां कर दी।
राजा अगले दिन के लिए रुक गया, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि..
कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था।
उस की भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है। रात काटने के बाद वो इस लिए नही गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नियत खोटी हो गई।
इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर ही ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा।
दिनभर चौपाल में उस राजा की निंदा होती रही।
अगली सुबह लड़की फिर सिमरन पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार सिमरन से उठ गई।
राजा ने पूछा.. "बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा ?"
लड़की ने बताया कि.. "वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट के ले गए।"
निंदा करना कितना घाटे का सौदा है। निंदक हमेशा दुसरों के पाप अपने सर पर ढोता रहता है।
और दूसरों द्वारा किये गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है। अतः हमें सदैव निंदा से बचना चाहिए। ..........

ज्यादा अतीत में न जायें तो भी 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज प्रशासनिक अफसर जब कलकत्ता के अपने दफ़्तर में बैठते थे तो प्र...
09/07/2021

ज्यादा अतीत में न जायें तो भी 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज प्रशासनिक अफसर जब कलकत्ता के अपने दफ़्तर में बैठते थे तो प्रोटोकॉल के अनुसार उनके पीछे की दीवार पर उस भारत का मानचित्र लगा होता था जिसे वो "इंडिया" कहकर पुकारते थे।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उस नक़्शे के अनुसार 1857 की क्रांति के समय भारत का क्षेत्रफल था लगभग 83 लाख वर्ग किलोमीटर जो आज घटकर मात्र लगभग 33 लाख वर्ग-किलोमीटर रह गया है।

यानि 1857 के बाद हमने अपनी भारतभूमि का लगभग पचास लाख वर्ग किलोमीटर भूभाग गँवा दिया।

मगर न तो हमें वेदना है न ही कोई शर्म 🙁

वैदिक मंदिर श्री अक्षरधाम मंदिर का सौंदर्य दृश्य।
03/07/2021

वैदिक मंदिर श्री अक्षरधाम मंदिर का सौंदर्य दृश्य।

क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ? यह तमिलनाडु का बृहदेश...
20/06/2021

क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ?

यह तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर है, यह बिना नींव का मंदिर है । इसे इंटरलॉकिंग विधि का उपयोग करके बनाया गया है इसके निर्माण में पत्थरों के बीच कोई सीमेंट, प्लास्टर या किसी भी तरह के चिपकने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया गया है इसके बावजूद पिछले 1000 वर्षों में 6 बड़े भूकंपो को झेलकर भी आज अपने मूल स्वरूप में है ।

216 फीट ऊंचा यह मंदिर उस समय दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर था। इसके निर्माण के कई वर्षों बाद बनी पीसा की मीनार खराब इंजीनियरिंग की वजह से समय के साथ झुक रही है लेकिन बृहदेश्वर मंदिर पीसा की मीनार से भी प्राचीन होने के बाद भी अपने अक्ष पर एक भी अंश का झुकाव नहीं रखता ।

इस मंदिर के निर्माण के लिए 1.3 लाख टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था जिसे 60 किलोमीटर दूर से 3000 हाथियों द्वारा ले जाया गया था। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वी को खोदे बिना किया गया था यानी यह मंदिर बिना नींव का मंदिर है ।

मंदिर टॉवर के शीर्ष पर स्थित शिखर का वजन 81 टन है आज के समय में इतनी ऊंचाई पर 81 टन वजनी पत्थर को उठाने के लिए आधुनिक मशीनें फेल हो जाएंगी ।

बृहदीश्वर मंदिर के निर्माण के लिए प्रयोग किए गए इंजीनियरिंग के स्तर को दुनिया के सात आश्चर्यों में से किसी भी आश्चर्य के निर्माण की तकनीक मुकाबला नहीं कर सकती और आज की तकनीकों को देखकर भविष्य में भी कई सदियों तक ऐसा निर्माण सम्भव नहीं दिखता है ।
साभार

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