17/08/2025
Pushkar Singh Dhami PMO India Narendra Modi Khushal Singh Adhikari
माननीय मुख्यमंत्री जी, उत्तराखंड सरकार, आपको प्रणाम- एक सीमांत गांव डुंगरालेटी की ओर से
महोदय,
आपका कीमती समय व्यर्थ न जाए, इसलिए बिना किसी औपचारिक भूमिका के सीधे मुद्दे पर आते हैं। बात उत्तराखंड राज्य के सबसे सीमांत जनपद, चंपावत, के एक अदृश्य गांव की है- डुंगरालेटी।
आपने शायद नाम भी न सुना हो। कोई अपराध नहीं है। आखिर इस गांव में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राज्य के शीर्ष नेतृत्व का ध्यान खींच सके। न कोई महायोजना का लोकार्पण, न किसी केंद्रीय मंत्री के दौरे की तस्वीरें, न वायरल होने लायक वीडियो, और न ही कोई ऐसी घटना जिससे मीडिया वाले ‘ब्रेकिंग’ बना सकें। डुंगरालेटी का गांव तो बस चुपचाप एक कोने में बैठा आपकी ओर देखता है। शायद इसी उम्मीद में कि कभी तो किसी मुख्यमंत्री की नजर पड़ेगी इस पर भी।
अब आते हैं उस योजना पर, जिसने गांव वालों को एक सपना दिखाया था-‘हर घर नल, हर घर जल’। डुंगरालेटी में भी इसी सपने की एक शाखा आई। लिफ्टिंग पेयजल योजना नाम की यह परियोजना गाँव की प्यास बुझाने आई थी। पर हुआ क्या? योजना का उद्घाटन नहीं हुआ, उद्घाटन के लिए रिबन तक नहीं खिंची, और उससे पहले ही बरसात आ गई। सब कुछ बहाकर ले गई। दैवीय आपदा थी, इसमें सरकार क्या करे! यह तर्क गांव वालों ने मन से मान भी लिया।
गांव वाले सरल हैं, इसलिए यह भी मान लिया कि मुख्यमंत्री जी का काम, हर गांव की नल-जल योजना देखना नहीं होता। उनके पास तो पूरा उत्तराखंड है। केदारनाथ से खटीमा तक, यमुनोत्री से यमकेश्वर तक।
महोदय, जल, अन्न और वायु- ये तीन बातें सभ्यता की नींव हैं। इन तीन में से एक पर भी प्रश्नचिन्ह लगे, तो बाकी सब कुछ ढकोसला रह जाता है। सड़क, बिजली, अस्पताल इत्यादि बातें तो दूर की कौड़ी हैं। डुंगरालेटी के लोग तो अभी भी गाड़-गधेरों से मटके में पानी ढोने की आदिम परंपरा निभा रहे हैं। गढ़वाल-कुमाऊं की कथाओं में गागर भरने वाली नायिकाएं आपने सुनी होंगी, मगर यहां तो पूरा गांव वही गागर भरता है रोज़।
सड़क है यह क्या कम उपलब्धि है। हां, अस्पताल तक पहुंचना चमत्कार है। बिजली आधे गांव में आती है और आधे में नहीं। मगर फिर भी, गांव वालों ने इन सब पर कभी आवाज नहीं उठाई। क्योंकि उन्हें यकीन है कि राज्य चलाना कोई आसान बात नहीं।
महोदय, यह भी गांव वालों को देर से पता चला कि आप इस बार उनके ही जनपद से विधायक बनकर मुख्यमंत्री बने हैं। गांव के एक नौजवान ने यह खबर होटलों में बर्तन धोते वक्त टीवी पर देखी थी। उसने बताया “देखो, ये वाले मुख्यमंत्री महोदय अपने जिले के हैं।”
गांव वालों को कुछ खास समझ नहीं आया, पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की - “चलो अच्छा हुआ, कोई तो अपना बैठा है कुर्सी पर।”
गांव का युवा आपके सामने कभी कुछ मांगता नहीं। उन्हें नौकरी नहीं चाहिए, स्कॉलरशिप नहीं चाहिए, स्टार्टअप योजना का लाभ नहीं चाहिए। क्योंकि उन्हें बचपन में सिखाया गया था कि स्वावलंबी बनो।
स्वावलंबन का मतलब निकला, होटल में बर्तन धोना, किसी की कोठी के बर्तन धोना, किसी की कोठी के गेट पर पहरा देना, ईंट ढोना, और इन सब कामों के लिए गांव ही नहीं राज्य छोड़ देना। अपने ही राज्य में यह सब करते तो आपका अपमान होता कि देखो अपनी ही जनता जनार्दन को कैसे नौकर चाकर बना रखा है।
बावजूद आप पर उनका इतना भरोसा है कि उन्होंने अपने बूढ़े मां-बाप और छोटे बच्चों को आपके भरोसे गांव में छोड़ रखा है। उम्मीद ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों के लोगों से लड़ पड़ते हैं बर्तन धोते धोते कि देखना “मुख्यमंत्री अपने जिले के हैं, कुछ न कुछ करेंगे।”
कई बार गांव से पूर्व में ही पलायन कर चुके लोगों ने समझाया भी कि “पलायन कर जाओ सपरिवार, कुछ नहीं होगा यहां।” मगर ये लोग नहीं माने। इनका कहना था कि “मुख्यमंत्री बहुत अच्छे हैं, बहुत लंबा कार्यकाल चल रहा है उनका, वो ज़रूर कुछ करेंगे।”
शायद किसी टीवी चैनल ने आपके लंबे कार्यकाल वाली बात का प्रचार किया होगा। गांव वालों ने वहीं से सुन लिया होगा।
महोदय, अगर इस गांव को पीने का पानी मिल जाए तो वे आपको अपने लोक देवी-देवताओं से भी ऊपर का स्थान देंगे। यह बड़ी बात है। क्योंकि यहां के लोकदेवता बहुत जल्द नाराज हो जाते हैं। बकरा न चढ़ाओ तो सूखा डाल देते हैं।
गांव वालों के पास देने के लिए कुछ है नहीं, इसलिए श्रद्धा से ही नापते हैं।
आप सोचिए, इतने श्रद्धालु वोटर आपको और क्या दे सकते हैं? यहां तो जब तक आप पानी नहीं देंगे, तब तक लोकदेवता भी नाराज रहेंगे। और जब पानी देंगे, तो आप सीधे उनकी बराबरी में आ जाएंगे।
वैसे अगर आपको या आपके किसी भी मातहत को ज़्यादा आपत्ति हो इस गांव के निवासियों से तो महाकाली नदी पास ही है। किश्ती में बैठाकर नेपाल भेज देना। पाकिस्तान तो दूर है, नेपाल पास है। और वैसे भी, इन गांव वालों की भाषा और जीवनशैली नेपाली सीमा के गांवों से मिलती है। इन्हें फर्क भी नहीं पड़ेगा।
प्रधानमंत्री जी ने कभी कहा था - “सीमांत गांव अब अंतिम नहीं, प्रथम गांव कहलाएंगे।” गांव वालों ने यह बात याद रखी। मगर अब वे भूलने लगे हैं। क्योंकि राज्य सरकार की प्राथमिकता में उनका नाम ही नहीं आता।
मुख्यमंत्री जी, हम समझते हैं। आपके पास बड़ी योजनाएं हैं। देहरादून में रिंग रोड बनानी है। हरिद्वार में गंगा तट सजाने हैं। केदारनाथ में नई पहाड़ियों को चमकाना है। डुंगरालेटी क्या चीज़ है आपके लिए?
इसलिए हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं- कृपया इस गांव की लिफ्टिंग पेयजल योजना अगले चुनाव तक शुरू न करें।
मरने दीजिए इन ढीठों को प्यासा। ये हैं ही इस लायक। ये लोग जी भी लेंगे वैसे ही जैसे पिछले सत्तर सालों से जी रहे हैं - गागर, मटका और गाड़ - गधेरों की मदद से।
आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं। पानी मिले या न मिले - वोट आपको ही मिलेगा। क्योंकि यहां के लोग भावुक हैं। इन्हें इस बात से ही गर्व है कि मुख्यमंत्री ने उनका जनपद चुना। वरना राज्य में बारह जनपद और भी तो थे, मगर आपने चंपावत ही चुना।
अंत में- एक बिन मांगी सलाह, मुख्यमंत्री जी! यह पानी वाली समस्या अगली सरकार के लिए छोड़ दीजिए। आप तो बड़े नेता हैं। किसी और काम में व्यस्त रहिए।
नई इमारतें बनाइए, सेमिनार कीजिए, बड़े-बड़े मंचों से घोषणा कीजिए, हेलीकॉप्टर से गांवों का दौरा कीजिए- मगर पानी मत दीजिए।
क्योंकि एक बार अगर पानी आ गया, तो ये गांव वाले हर बार सवाल पूछेंगे- बिजली क्यों नहीं? स्कूल क्यों नहीं? अस्पताल कब बनेगा?
यानी अगर आपने एक जरूरत पूरी कर दी, तो बाकी जरूरतों की भूख भी जगेगी। फिर कौन समझाएगा इन्हें?
आपका समय कीमती है। इस सीमांत गांव से शुभकामनाएं।
प्यास, उम्मीद और आदर के साथ,
डुंगरालेटी गांव के ढीठ लोग।
゚