Rupesh Rajak Rakesh

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15/01/2025

कुंभ कथा।

मैं जितने साल जी चुका हूँ , उससे अब कम साल मुझे जीना है। यह समझ आने के बाद मुझमें यह परिवर्तन आया है :१. किसी प्रियजन की...
06/01/2025

मैं जितने साल जी चुका हूँ , उससे अब कम साल मुझे जीना है। यह समझ आने के बाद मुझमें यह परिवर्तन आया है :

१. किसी प्रियजन की विदाई से अब मैं रोना छोड़ चुका हूँ क्योंकि आज नहीं तो कल मेरी बारी है।

२. उसी प्रकार ,अगर मेरी विदाई अचानक हो जाती है , तो मेरे बाद लोगों का क्या होगा , यह सोचना भी छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जाने के बाद कोई भूखा नहीं रहेगा और मेरी संपत्ति को कोई छोड़ने या दान करने की ज़रूरत नहीं है।

३. सामने वाले व्यक्ति के पैसे , पावर और पोजीशन से अब मैं डरता नहीं हूँ।

४. खुद के लिए सबसे अधिक समय निकालता हूँ। मान लिया है कि दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है। मेरे बिना कुछ रुकने वाला नहीं है।

५. छोटे व्यापारियों और फेरीवालों के साथ मोल-भाव करना बंद कर दिया है। कभी-कभी जानता हूँ कि मैं ठगा जा रहा हूँ , फिर भी हँसते-मुस्कुराते चला जाता हूँ।

६. कबाड़ उठाने वालों को फटी या खाली तेल की डिब्बी वैसे ही दे देता हूँ , पच्चीस-पचास रुपये खर्च करता हूँl जब उनके चेहरे पर लाखों मिलने की खुशी देखता हूँ तो खुश हो जाता हूँ।

७. सड़क पर व्यापार करने वालों से कभी-कभी बेकार की चीज़ भी खरीद लेता हूँ।

८. बुजुर्गों और बच्चों की एक ही बात कितनी बार सुन लेता हूँ। कहने की आदत छोड़ दी है कि उन्होंने यह बात कई बार कही है।

९. गलत व्यक्ति के साथ बहस करने की बजाय मानसिक शांति बनाए रखना पसंद करता हूँ।

१०. लोगों के अच्छे काम या विचारों की खुले दिल से प्रशंसा करता हूँ। ऐसा करने से मिलने वाले आनंद का मजा लेता हूँ।

११. ब्रांडेड कपड़ों , मोबाइल या अन्य किसी ब्रांडेड चीज़ से व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना छोड़ दिया है। व्यक्तित्व विचारों से निखरता है , ब्रांडेड चीज़ों से नहीं , यह समझ गया हूँ।

१२. मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ जो अपनी बुरी आदतों और जड़ मान्यताओं को मुझ पर थोपने की कोशिश करते हैं। अब उन्हें सुधारने की कोशिश नहीं करता क्योंकि कई लोगों ने यह पहले ही कर दिया है।

१३. जब कोई मुझे जीवन की दौड़ में पीछे छोड़ने के लिए चालें खेलता है , तो मैं शांत रहकर उसे रास्ता दे देता हूँ। आखिरकार , ना तो मैं जीवन की प्रतिस्पर्धा में हूँ , ना ही मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी है।

१४. मैं वही करता हूँ जिससे मुझे आनंद आता है। लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे , इसकी चिंता छोड़ दी है। चार लोगों को खुश रखने के लिए अपना मन मारना छोड़ दिया है।

१५. फाइव स्टार होटल में रहने की बजाय प्रकृति के करीब जाना पसंद करता हूँ। जंक फूड की बजाय बाजरे की रोटी और आलू की सब्जी में संतोष पाता हूँ।

१६. अपने ऊपर हजारों रुपये खर्च करने की बजाय किसी जरूरतमंद के हाथ में पाँच सौ हजार रुपये देने का आनंद लेना सीख गया हूँ। और हर किसी की मदद पहले भी करता था और अब भी करता हूँ।

१७. गलत के सामने सही साबित करने की बजाय मौन रहना पसंद करने लगा हूँ। बोलने की बजाय चुप रहना पसंद करने लगा हूँ। खुद से प्यार करने लगा हूँ।

१८. मैं बस इस दुनिया का यात्री हूँl मैं अपने साथ केवल वह प्रेम , आदर और मानवता ही ले जा सकूंगा जो मैंने बाँटी हैl यह मैंने स्वीकार कर लिया है।

१९. मेरा शरीर मेरे माता-पिता का दिया हुआ हैl आत्मा परम कृपालु प्रकृति का दान है और नाम फॉइबा का दिया हुआ है... जब मेरा अपना कुछ भी नहीं है , तो लाभ-हानि की क्या गणना ?

२०. अपनी सभी प्रकार की कठिनाइयाँ या दुख लोगों को कहना छोड़ दिया है , क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि जो समझता है उसे कहना नहीं पड़ता और जिसे कहना पड़ता है वह समझता ही नहीं।

२१. अब अपने आनंद में ही मस्त रहता हूँ क्योंकि मेरे किसी भी सुख या दुख के लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूँl यह मुझे समझ आ गया है।

२२. हर पल को जीना सीख गया हूँ क्योंकि अब समझ आ गया है कि जीवन बहुत ही अमूल्य हैl यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं हैl कुछ भी कभी भी हो सकता है , ये दिन भी बीत जाएँगे।

२३. आंतरिक आनंद के लिए मानव सेवा , जीव दया और प्रकृति की सेवा में डूब गया हूँl मुझे समझ आया है कि अनंत का मार्ग इन्हीं से मिलता है।

२४. प्रकृति और देवी-देवताओं की गोद में रहने लगा हूँl मुझे समझ आया है कि अंत में उन्हीं की गोद में समा जाना है।

देर से ही सही , लेकिन समझ आ गया हैl शायद मुझे जीना आ गया हैl

03/01/2025
07/09/2024

एक जमाना था...
खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे...
उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था,
🤪 पास/नापास यही हमको मालूम था... *%* से हमारा कभी भी संबंध ही नहीं था...
😛 ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था...
🤣🤣🤣
किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी...
☺️☺️ कपड़े की थैली में...बस्तों में..और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में...
किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी.. ..
😁 हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम...
एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था.....
🤗 साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी..
क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम...
🤪 हमारे माताजी पिताजी को हमारी पढ़ाई बोझ है..
ऐसा कभी लगा ही नहीं....
😞 किसी एक दोस्त को साइकिल के अगले डंडे पर और दूसरे दोस्त को पीछे कैरियर पर बिठाकर गली-गली में घूमना हमारी दिनचर्या थी....
इस तरह हम ना जाने कितना घूमे होंगे....

🥸😎 स्कूल में मास्टर जी के हाथ से मार खाना, पैर के अंगूठे पकड़ कर खड़े रहना, और कान लाल होने तक मरोड़े जाते वक्त हमारा ईगो कभी आड़े नहीं आता था.... सही बोले तो ईगो क्या होता है यह हमें मालूम ही नहीं था...
🧐😝 घर और स्कूल में मार खाना भी हमारे दैनंदिन जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी.....

मारने वाला और मार खाने वाला दोनों ही खुश रहते थे...
मार खाने वाला इसलिए क्योंकि कल से आज कम पिटे हैं और मारने वाला इसलिए कि आज फिर हाथ धो लिए 😀......

😜 बिना चप्पल जूते के और किसी भी गेंद के साथ लकड़ी के पटियों से कहीं पर भी नंगे पैर क्रिकेट खेलने में क्या सुख था वह हमको ही पता है...

😁 हमने पॉकेट मनी कभी भी मांगी ही नहीं और पिताजी ने कभी दी भी नहीं....इसलिए हमारी आवश्यकता भी छोटी छोटी सी ही थीं....साल में कभी-कभार दो चार बार सेव मिक्सचर मुरमुरे का भेल, गोली टॉफी खा लिया तो बहुत होता था......उसमें भी हम बहुत खुश हो लेते थे.....
😲 छोटी मोटी जरूरतें तो घर में ही कोई भी पूरी कर देता था क्योंकि परिवार संयुक्त होते थे ..
🥱 दिवाली में लगी पटाखों की लड़ी को छुट्टा करके एक एक पटाखा फोड़ते रहने में हमको कभी अपमान नहीं लगा...

😁 हम....हमारे मां बाप को कभी बता ही नहीं पाए कि हम आपको कितना प्रेम करते हैं क्योंकि हमको आई लव यू कहना ही नहीं आता था...
😌 आज हम दुनिया के असंख्य धक्के और टाॅन्ट खाते हुए......
और संघर्ष करती हुई दुनिया का एक हिस्सा है..किसी को जो चाहिए था वह मिला और किसी को कुछ मिला कि नहीं..क्या पता..
😀 स्कूल की डबल ट्रिपल सीट पर घूमने वाले हम और स्कूल के बाहर उस हाफ पेंट मैं रहकर गोली टाॅफी बेचने वाले की दुकान पर दोस्तों द्वारा खिलाए पिलाए जाने की कृपा हमें याद है.....
वह दोस्त कहां खो गए , वह बेर वाली कहां खो गई....
वह चूरन बेचने वाली कहां खो गई...पता नहीं..

😇 हम दुनिया में कहीं भी रहे पर यह सत्य है कि हम वास्तविक दुनिया में बड़े हुए हैं हमारा वास्तविकता से सामना वास्तव में ही हुआ है...

🙃 कपड़ों में सलवटें ना पड़ने देना और रिश्तों में औपचारिकता का पालन करना हमें जमा ही नहीं......
सुबह का खाना और रात का खाना इसके सिवा टिफिन में अखबार में लपेट कर रोटी ले जाने का सुख क्या है, आजकल के बच्चों को पता ही नही ...
😀 हम अपने नसीब को दोष नहीं देते....जो जी रहे हैं वह आनंद से जी रहे हैं और यही सोचते हैं....और यही सोच हमें जीने में मदद कर रही है.. जो जीवन हमने जिया...उसकी वर्तमान से तुलना हो ही नहीं सकती ,,,,,,,,

😌 हम अच्छे थे या बुरे थे नहीं मालूम , पर हमारा भी एक जमाना था

🙏 और Most importantly , आज संकोच से निकलकर , दिल से अपने साक्षात देवी _देवता तुल्य , प्रात स्मरणीय , माता _ पिता , भाई एवं बहन को कहना चाहता हूं कि मैं आपके अतुल्य लाड, प्यार , आशीर्वाद , लालन पालन व दिए गए संस्कारो का ऋणी हूं 🙏,
🙏🏻☺😊
एक बात तो तय मानिए को जो भी👆🏻 पूरा पढ़ेगा उसे अपने बीते जीवन के कई पुराने सुहाने पल अवश्य याद आयेंगे।♥️♥️💔
Rupesh

पेड़ों पर एक पत्ता नहीं है पर किसान को गर्मी नहीं लग रही।वो सोच रहा है सूखा हुआ ये मंजर एक दिन हर भरा तो होगाऊपर वाले से...
21/05/2024

पेड़ों पर एक पत्ता नहीं है पर किसान को गर्मी नहीं लग रही।वो सोच रहा है
सूखा हुआ ये मंजर एक दिन हर भरा तो होगा
ऊपर वाले से आस है चिड़ियो के भाग का तो देगा।

किसान के खेत की ये तस्वीर सबकुछ बयान कर रही हैं।कैसे एक किसान शून्य में भी संभावना ढूँढता है उसे नहीं पता कि बारिश होगी या नहीं पर फिर भी वो खेत तैयार करता है।

Our life depends on our thoughts.
19/03/2024

Our life depends on our thoughts.

आप बेतिया राज (बिहार) के महाराजा राजेंद्र किशोर सिंह हैं। आप 1855 से 1883 तक बेतिया के शासक रहे।आपके बारे में बहादुर शाह...
28/02/2024

आप बेतिया राज (बिहार) के महाराजा राजेंद्र किशोर सिंह हैं। आप 1855 से 1883 तक बेतिया के शासक रहे।

आपके बारे में बहादुर शाह ज़फ़र के सबसे बड़े बेटे मिर्ज़ा मोहम्मद दारा बख़्त के बेटे मिर्ज़ा मुहम्मद रईस बख़्त ज़ुबैरूद्दीन 'गोरगान' ने अपने ऑटोबायोग्राफ़ी 'मौज-ए-सुल्तानी' जो लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से 1884 में शाय हुई थी।

उसमें शहज़ादा गोरगान लिखते हैं कि 1881 में जब वो सेंट्रल इंडिया होते हुए पटना के रास्ते मुज़फ़्फ़रपुर के बाद बेतिया पहुँचे तो वहाँ के महाराज राजेंद्र किशोर सिंह ने उनके लिए एक बड़ा मकान रहने के लिए सही करवाया। और अगले दिन रात में पालकी, अरदली और मशाल भेजकर अपने महल में आने का न्योता दिया।

और जब शहज़ादा गोरगान महल पहुंचे, तब महाराज राजेंद्र किशोर सिंह उनका स्वागत करने ख़ुद बरामदे तक आए। और अपने शीशमहल में ले जाकर उन्हें बैठने के लिए प्रतिष्ठित जगह दिया और ख़ुद हाथ बांधे खड़े हो गए।

शहज़ादा गोरगान के लाख बोलने पर भी वो नहीं बैठे। क्योंकि उनकी नज़र में वो एक मुग़ल शहज़ादे थे। और पुरानी वफ़ादारी का परिचय देते हुए उन्होंने ऐसा किया, क्योंकि बेतिया राज मुग़ल बादशाहों के वफ़ादार थे। और शाहजहां ने यहाँ के हाकिम को राजा का ख़िताब दिया था।

जब शहज़ादा गोरगान बेतिया महल से जाने लगे तब महाराज ने उन्हें इतर, फूल और पान सहित ग्यारह थाल उपहार के साथ रुख़्सत किया। सुनने में ये बात एक गप लगेगा, लेकिन जो ख़ानदानी रईस हैं, वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना।

- शहज़ादा गोरगान की लिखी पूरी किताब उर्दू और हिन्दी दोनों ज़ुबान में मौजूद है।

#इतिहास

ये नहीं तो कौन वे।
21/02/2024

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12/02/2024

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