30/10/2025
जनता पूछ रही है: सईदी रोड कब बनेगा चेयरमैन साहब?
नगर पालिका की व्यवस्था पर सवाल, वार्डों में बदहाली, अब सोशल मीडिया नहीं, ज़मीन पर चाहिए जवाब।
✍️ रिपोर्ट: मोहम्मद रेहान पत्रकार
मऊ नगर की सियासत इन दिनों विकास से ज़्यादा दिखावे में उलझी है। वर्तमान चेयरमैन अरशद जमाल और पूर्व चेयरमैन तैय्यब पालकी के बीच सोशल मीडिया पर चल रही जुबानी जंग ने जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटका दिया है। लेकिन अब जनता खामोश नहीं है। वह खुलकर सवाल पूछ रही है कि आखिर नगर का हाल कब सुधरेगा?
सईदी रोड की धूल में घुटती ज़िंदगी
सईदी रोड से होकर रोज़ाना सैकड़ों लोग गुजरते हैं, लेकिन सड़क नहीं — मानो धूल का मैदान हो। आसपास के घरों में रहने वाले परिवारों का जीना मुहाल हो गया है।
एक स्थानीय निवासी ने कहा —
> “धूल-मिट्टी से सांस लेना मुश्किल हो गया है, बच्चे बीमार पड़ रहे हैं और कोई सुनने वाला नहीं।”
जनता का सीधा सवाल है चेयरमैन अरशद जमाल से —
“सईदी रोड आखिर कब बनेगी?” लोगों का कहना है कि विकास की पोस्ट तो खूब आती हैं, लेकिन सड़क अब भी टूटी पड़ी है।
नगर पालिका की सुस्ती — जन्म प्रमाणपत्र बना ‘धैर्य परीक्षा’
नगर पालिका का हाल तो और भी परेशान करने वाला है।
एक साधारण जन्म प्रमाणपत्र बनवाने में छह-छह महीने का वक्त लग जाता है। लोग कहते हैं कि आवेदन करने के बाद हर हफ्ते दफ्तर का चक्कर लगाना पड़ता है, फिर भी जवाब वही अभी फाइल लंबित है। जनता थक चुकी है, पर प्रक्रिया नहीं चलती। यह स्थिति उस नगर की है जो “स्मार्ट सिटी” के सपने देखता है।
वार्ड 34 की तस्वीर — जनता ने खुद उठाई झाड़ू
वार्ड नंबर 34 में सफाई व्यवस्था नाम की चीज़ नहीं बची। लोग मजबूर होकर अपने बच्चों के साथ नालियाँ साफ कर रहे हैं।
एक स्थानीय निवासी परवेज़ ने बताया —
> “जब नगर पालिका नहीं आएगी तो हमें ही करना पड़ेगा, वरना घर के सामने गंदगी फैल जाएगी।”
यह तस्वीर बहुत कुछ कहती है। कि नगर प्रशासन के वादे और ज़मीनी हालात में कितना अंतर है।
आबिद अख़्तर से भी सवाल — पोस्ट नहीं, उपस्थित रहिए....
अब जनता सिर्फ सत्ता पक्ष से नहीं, बल्कि संभावित प्रत्याशियों से भी सवाल कर रही है।
"आबिद अख़्तर से लोगों का कहना है"
> “जनता को ऐसे नेता की जरूरत है जो सिर्फ़ सोशल मीडिया पर नहीं, उनके सुख-दुख में भी मौजूद रहे।”
घर की समस्या हो, मोहल्ले की सफाई या किसी निर्दोष को थाने तक ले जाने का मामला, जनता अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो मुश्किल वक्त में साथ खड़ा रहे, न कि केवल लाइक और शेयर गिने।
बुनकरों की आवाज़ — हर चुनाव में वादा, हर बार निराशा
मऊ की पहचान उसकी बुनकरी से है, लेकिन बुनकर आज भी संघर्ष में हैं। हर चुनाव में उनके नाम पर घोषणाएँ होती हैं, मगर ज़मीनी बदलाव नहीं। बिजली की दरें, उत्पादन की लागत और बाज़ार में बिक्री की समस्या सब जस की तस। कई बुनकरों का कहना है कि उन्हें अब भाषण नहीं, सहारा चाहिए।
जनता का मूड — “अब नाम नहीं, काम चाहिए”
मऊ की जनता अब साफ कह रही है कि उन्हें शिलापट नहीं, साफ़ सड़कें, सुचारू सफाई और तेज़ प्रशासन चाहिए।
किसी नागरिक ने सोशल मीडिया पर लिखा —
> “नाम बदलने से काम नहीं बदलता, ज़मीन पर सुधार चाहिए।”
लोग चाहते हैं कि नेता फेसबुक की बहस छोड़कर उन गलियों में उतरें जहाँ हालात सबसे ख़राब हैं।
पत्रकार की नज़र से निष्कर्ष
इस पूरे विवाद में एक बात साफ़ है। जनता अब सिर्फ़ नारे नहीं सुनना चाहती। सईदी रोड की धूल, जन्म प्रमाणपत्र की देरी, वार्डों की गंदगी और बुनकरों की परेशानी — ये सब मिलकर बता रहे हैं कि मऊ को सोशल मीडिया पर नहीं, ज़मीन पर सक्रिय नेतृत्व चाहिए।
अब मऊ के लोग कह रहे हैं —
> “बस पोस्ट नहीं, काम दिखाइए चेयरमैन साहब — नाम अपने आप बन जाएगा।”
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